
वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज रिपोर्ट

भारतीय इतिहास में 14 अक्टूबर 1956 एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज है, जब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने 365,000 अनुयायियों के साथ हिंदू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म अपनाया।
डॉ. अंबेडकर ने 13 अक्टूबर 1935 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के येवला में यह ऐलान किया था:
> “दुर्भाग्यवश मैं हिंदू अछूत के रूप में जन्मा, यह मेरे हाथ में नहीं था। लेकिन मैं यह घोषणा करता हूं कि मैं नीच और अपमानजनक स्थिति में जीना स्वीकार नहीं करूंगा। मैं आपको यह दृढ़ आश्वासन देता हूं कि मैं हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं।”
यह ऐलान भारतीय सामाजिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ बन गया।
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ऐतिहासिक निर्णय की नींव: 1936 में पहला सम्मेलन
अंबेडकर ने अपने धर्म परिवर्तन आंदोलन की नींव 1936 में मुंबई के दादर में रखी। इस सम्मेलन में करीब 35,000 महार समुदाय के लोग शामिल हुए। उन्होंने धर्म के उद्देश्य पर प्रश्न उठाए और कहा कि धर्म का उद्देश्य मनुष्य को नैतिकता, समानता और स्वतंत्रता के मार्ग पर ले जाना है, न कि उसे सामाजिक ढांचे में बांधना।
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डॉ. अंबेडकर का जीवन: संघर्ष की कहानी
जन्म: 14 अप्रैल 1891, महू (मध्य प्रदेश)
जाति: महार (अछूत)
शिक्षा: बॉम्बे से मैट्रिक, फिर अमेरिका और इंग्लैंड में अर्थशास्त्र, कानून और राजनीति शास्त्र में डॉक्टरेट
पेशा: वकील और समाज सुधारक
जातिगत भेदभाव: स्कूल में अलग बैठना, अलग पानी पीना, शिक्षक उनसे डरते थे।
संघर्ष:
1920 का महाड़ सत्याग्रह: दलितों को सार्वजनिक तालाब से पानी पीने का अधिकार
1930 की राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस: दलितों के लिए अलग प्रतिनिधित्व की मांग
1932 पूना पैक्ट: आरक्षण मिला, लेकिन अंबेडकर संतुष्ट नहीं थे
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हिंदू धर्म के प्रति असंतोष
अंबेडकर मानते थे कि हिंदू धर्म की चतुर्वर्ण व्यवस्था दलितों को हमेशा हाशिए पर रखेगी। उन्होंने 1935 में स्पष्ट कहा:
> “मैं हिंदू पैदा हुआ हूं, लेकिन हिंदू मरूंगा नहीं।”
उन्होंने ईसाई, इस्लाम, सिख और बौद्ध धर्म का अध्ययन किया। अंततः बौद्ध धर्म चुना क्योंकि यह समानता, अहिंसा और बुद्धि पर जोर देता था।
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बौद्ध धर्म अपनाने की प्रक्रिया
20 वर्षों तक विभिन्न धर्मों का अध्ययन
इस्लाम और ईसाई धर्म को खारिज
‘नवयान बौद्ध धर्म’ की स्थापना, जहां बौद्ध धर्म के कुछ हिस्सों को तर्क और आधुनिकता के आधार पर संशोधित किया गया
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ऐतिहासिक दिन: 14 अक्टूबर 1956, नागपुर
स्थल: दीक्षा भूमि, नागपुर
अंबेडकर ने भिक्षु महास्थविर चंद्रमणि से बौद्ध दीक्षा ली
प्रतिज्ञाएँ: 22, जिसमें हिंदू देवी-देवताओं को न मानना और बौद्ध सिद्धांतों का पालन करना शामिल था
सहभागी: पत्नी सविता अंबेडकर और लगभग 5 लाख अनुयायी
यह दुनिया का सबसे बड़ा सामूहिक धर्मांतरण माना जाता है।
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महत्व और प्रभाव
1. दलित अधिकारों की नई पहचान: अब दलित खुद को बौद्ध कह सकते थे, जाति से ऊपर।
2. समकालीन विद्वानों की व्याख्या:
राजनीतिक विरोध और पूना समझौते के बाद निराशा
जीवनभर का हिंदू धर्म के खिलाफ संघर्ष
आधुनिकता और तर्क पर आधारित बौद्ध धर्म का चयन
3. दलित आंदोलन को नई गति:
1951: बौद्धों की संख्या 141,426
1961: बढ़कर 3,206,142
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डॉ. अंबेडकर की 6 दिसंबर 1956 को मृत्यु के बाद भी उनका बौद्ध धर्म अपनाने का कदम भारतीय समाज में समानता और न्याय की प्रेरणा बना रहा।









