
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती में ‘कामचोर’ सिस्टम पर चला प्रशासन का हंटर: हरैया के 9 लेखपालों का वेतन ठप, सदर में 20 को नोटिस!
- फार्मर रजिस्ट्री में लापरवाही पड़ी भारी, दर्जनों लेखपालों पर बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक!
- बस्ती प्रशासन के सख्त तेवर: फाइल दबाकर बैठने वाले 29 लेखपालों पर एक्शन, अब नपेगी कुर्सी!
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
बस्ती। सरकारी कुर्सी पर बैठकर जनता के काम में ‘लापरवाही’ की रोटियां सेकने वाले कर्मचारियों की अब खैर नहीं! बस्ती जिलाधिकारी (DM) के सख्त तेवरों ने राजस्व विभाग में हड़कंप मचा दिया है। शासन की प्राथमिकता वाली ‘फार्मर रजिस्ट्री’ योजना में डंडी मारना अब हरैया और सदर तहसील के लेखपालों को भारी पड़ गया है।
लापरवाही पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’
6 से 15 अप्रैल तक चले विशेष अभियान में जिन लेखपालों ने काम को गंभीरता से नहीं लिया, उन्हें प्रशासन ने सीधा संदेश दे दिया है— “काम नहीं तो दाम नहीं।” मुख्य राजस्व अधिकारी और तहसीलदार हरैया की गाज गिरते ही हरैया के 9 लेखपालों का अप्रैल माह का वेतन तत्काल प्रभाव से रोक दिया गया है। इतना ही नहीं, सदर तहसील के 20 लेखपालों को कारण बताओ नोटिस जारी कर अंतिम चेतावनी दी गई है।
इनके ‘नाम’ पर गिरी गाज
हरैया तहसील के जिन 9 लेखपालों का वेतन रोका गया है, उनके नाम इस प्रकार हैं:
अवधेश यादव, सोनिका वर्मा, सुमित कुमार मौर्य, राहुल गोस्वामी, भोला पासी, राजेश भास्कर, कौशलेन्द्र कुमार श्रीवास्तव और अख्तर आलम।
लक्ष्य से कोसों दूर, कुर्सी से मजबूर!
प्रशासन ने हरैया और सदर तहसील को रोजाना 3500 फार्मर रजिस्ट्री का लक्ष्य दिया था, जबकि भानपुर और रुधौली के लिए यह लक्ष्य 1500 था। लेकिन फील्ड पर तैनात इन महारथियों की सुस्ती की वजह से जनपद अभी भी अपने पूर्ण लक्ष्य से पीछे है। जनपद के कुल 5.20 लाख किसानों में से अब तक केवल 71.31% ही रजिस्टर हो पाए हैं। शेष किसानों का भविष्य इन लापरवाह कर्मचारियों की फाइलों में अटका पड़ा है।
सीधा प्रहार: बिचौलियों का खेल खत्म, तो क्यों है दर्द?
फार्मर रजिस्ट्री का सीधा फायदा यह है कि पीएम किसान, फसल बीमा और अन्य सरकारी योजनाओं का पैसा बिना किसी ‘कट’ या बिचौलिए के सीधे किसानों के खाते में जाएगा। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या ये कर्मचारी व्यवस्था को पारदर्शी बनाने में रोड़ा बन रहे हैं?
प्रशासन की चेतावनी:
मुख्य राजस्व अधिकारी ने साफ कर दिया है कि जो कर्मचारी कैंप से नदारद रहेंगे या काम में शिथिलता बरतेंगे, उनके खिलाफ केवल वेतन रोकना तो शुरुआत है, आगे कठोर विभागीय कार्रवाई भी होगी।
बस्ती प्रशासन का यह कड़ा रुख उन सभी के लिए सबक है जो सरकारी सेवा को केवल ‘आराम’ की नौकरी समझते हैं। अब देखना यह है कि इस कार्रवाई के बाद व्यवस्था कितनी सुधरती है!


















