निपाह वायरस (Nipah Virus) को लेकर झारखंड अलर्ट. डॉ इरफान अंसारी पश्चिम बंगाल में निपाह वायरस से दो लोगों की मृत्यु के बाद झारखंड सरकार पूरी तरह सतर्क हो गई है। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने राज्य के सभी जिलों के सिविल सर्जनों को अलर्ट मोड में रहने का निर्देश दिया है। इस संबंध में स्वास्थ्य विभाग के एक्स्ट्रा एडिशनल सेक्रेटरी श्री अजय कुमार को भी आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए हैं। निपाह वायरस के प्रमुख लक्षणों में शुरुआती बुखार, सिरदर्द, खांसी, सांस लेने में तकलीफ, गले में खराश, तेज सिरदर्द, मस्तिष्क पर तीव्र प्रभाव (ब्रेन अटैक), मानसिक सूजन (एन्सेफेलाइटिस) तथा कोमा जैसी गंभीर स्थितियाँ शामिल हैं। यह एक अत्यंत खतरनाक जानवर से इंसान में फैलने वाली (ज़ूनोटिक) बीमारी है। निपाह वायरस मुख्य रूप से फल खाने वाले चमगादड़ों (फ्रूट बैट) से फैलता है। इसके अलावा संक्रमित जानवरों, विशेषकर सूअरों के सीधे संपर्क, उनके संक्रमित मांस के सेवन, या संक्रमित व्यक्ति के शरीर से निकलने वाले द्रवों (जैसे लार, रक्त आदि) के सीधे संपर्क में आने से भी यह संक्रमण फैल सकता है। इस बीमारी की मृत्यु दर (फैटेलिटी रेट) बहुत अधिक है, जो प्रकोप की स्थिति के अनुसार 40 प्रतिशत से 75 प्रतिशत तक हो सकती है। यही कारण है कि निपाह वायरस को अत्यंत गंभीर और घातक रोग माना जाता है। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सभी जिलों में सख्त निगरानी, त्वरित रिपोर्टिंग व्यवस्था, और जन-जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएँ, ताकि लोगों को इस बीमारी के लक्षण, बचाव और सावधानियों की पूरी जानकारी मिल सके और झारखंड में इसका कोई भी प्रकोप न होने पाए। झारखंड सरकार इस खतरनाक बीमारी की रोकथाम के लिए पूरी तरह मुस्तैद है और स्वास्थ्य विभाग को हर स्तर पर सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।
निपाह वायरस (Nipah Virus) को लेकर झारखंड अलर्ट. डॉ इरफान अंसारी पश्चिम बंगाल में निपाह वायरस से दो लोगों की मृत्यु के बाद झारखंड सरकार पूरी तरह सतर्क हो गई है। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने राज्य के सभी जिलों के सिविल सर्जनों को अलर्ट मोड में रहने का निर्देश दिया है। इस संबंध में स्वास्थ्य विभाग के एक्स्ट्रा एडिशनल सेक्रेटरी श्री अजय कुमार को भी आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए हैं। निपाह वायरस के प्रमुख लक्षणों में शुरुआती बुखार, सिरदर्द, खांसी, सांस लेने में तकलीफ, गले में खराश, तेज सिरदर्द, मस्तिष्क पर तीव्र प्रभाव (ब्रेन अटैक), मानसिक सूजन (एन्सेफेलाइटिस) तथा कोमा जैसी गंभीर स्थितियाँ शामिल हैं। यह एक अत्यंत खतरनाक जानवर से इंसान में फैलने वाली (ज़ूनोटिक) बीमारी है। निपाह वायरस मुख्य रूप से फल खाने वाले चमगादड़ों (फ्रूट बैट) से फैलता है। इसके अलावा संक्रमित जानवरों, विशेषकर सूअरों के सीधे संपर्क, उनके संक्रमित मांस के सेवन, या संक्रमित व्यक्ति के शरीर से निकलने वाले द्रवों (जैसे लार, रक्त आदि) के सीधे संपर्क में आने से भी यह संक्रमण फैल सकता है। इस बीमारी की मृत्यु दर (फैटेलिटी रेट) बहुत अधिक है, जो प्रकोप की स्थिति के अनुसार 40 प्रतिशत से 75 प्रतिशत तक हो सकती है। यही कारण है कि निपाह वायरस को अत्यंत गंभीर और घातक रोग माना जाता है। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सभी जिलों में सख्त निगरानी, त्वरित रिपोर्टिंग व्यवस्था, और जन-जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएँ, ताकि लोगों को इस बीमारी के लक्षण, बचाव और सावधानियों की पूरी जानकारी मिल सके और झारखंड में इसका कोई भी प्रकोप न होने पाए। झारखंड सरकार इस खतरनाक बीमारी की रोकथाम के लिए पूरी तरह मुस्तैद है और स्वास्थ्य विभाग को हर स्तर पर सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।
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03/03/2026
होली की धूम
03/03/2026
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03/03/2026
*☘️विश्व वन्यजीव दिवस-सनातन संस्कृति के आलोक में प्रकृति और प्राणी मात्र की रक्षा का संकल्प* *✨सनातन जीवनदृष्टि में पर्यावरण की समस्त समस्याओं का समाधान निहित* ऋषिकेश, 3 मार्च। आज सम्पूर्ण विश्व में विश्व वन्यजीव दिवस मनाया जा रहा है। यह दिन पशु-पक्षियों और वन्य प्राणियों की विविधता का उत्सव है, जो हमें स्मरण कराता है कि पृथ्वी पर जीवन का संतुलन इन्हीं जीवों से संचालित होता है। यूनाइटेड नेशन द्वारा स्थापित यह दिवस मानवता को वन्यजीव संरक्षण, प्राकृतिक आवासों की रक्षा तथा सतत जीवनशैली अपनाने का संदेश देता है। स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारतीय दृष्टि से देखें तो वन्यजीव संरक्षण हमारी सनातन परंपरा की आत्मा है। सनातन धर्म में समस्त सृष्टि ईश्वर का ही विस्तार है “ईशावास्यमिदं सर्वम्।” जब हम किसी जीव की रक्षा करते हैं, तो वस्तुतः हम उसी परम चेतना की सेवा करते हैं। यही कारण है कि हमारी संस्कृति में ऐसे असंख्य जीव हैं जिन्हें दैवीय स्वरूप प्रदान किया गया। यह केवल आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। भारत के प्राचीन आश्रम, गुरुकुल और वनवासी जीवन प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व के आदर्श उदाहरण रहे हैं। ऋषि-मुनियों ने वनों को तपोभूमि बनाया, नदियों को माता कहा और पशु-पक्षियों को परिवार का अंग माना। आज जब विश्व जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता की हानि और पारिस्थितिक असंतुलन से जूझ रहा है, तब हमारी यही सनातन जीवनदृष्टि समाधान प्रस्तुत करती है। दुर्भाग्यवश, शिकार, अवैध व्यापार, वनों की कटाई, प्रदूषण और अंधाधुंध विकास ने अनेक प्रजातियों को विलुप्ति के कगार पर पहुँचा दिया है। यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक संकट भी है। जब मनुष्य स्वार्थवश प्रकृति का दोहन करता है, तब वह अपनी जड़ों से कट जाता है। हमें विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। हमारा संकल्प यह होना चाहिये कि हम सतत जीवनशैली अपनाएँ, प्लास्टिक का न्यूनतम उपयोग करें, जल और ऊर्जा की बचत करें, वृक्षारोपण करें, जैविक खेती को बढ़ावा दें और स्थानीय जैव विविधता की रक्षा करें। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाए ताकि युवा पीढ़ी प्रकृति के प्रति संवेदनशील बने। भारतीय संस्कृति हमें सिखाती है “वसुधैव कुटुम्बकम्।” जब पूरी धरती हमारा परिवार है, तो वन्यजीव भी हमारे ही परिवार के सदस्य हैं। परिवार की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। हमें यह समझना होगा कि जंगलों को बचाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। आज विश्व वन्यजीव दिवस पर आइए हम यह प्रतिज्ञा लें कि हम प्रकृति के साथ युद्ध नहीं, सहयोग का मार्ग चुनेंगे। हम अपने बच्चों को ऐसी जीवनशैली देंगे जो धरती का सम्मान करे। हम अपने पर्व-त्योहारों, संस्कारों और दैनिक व्यवहार में पर्यावरण संरक्षण को स्थान देंगे। यही सच्ची राष्ट्रभक्ति है, यही सनातन संस्कृति की पहचान है। वन्यजीवों की रक्षा केवल जैव विविधता की रक्षा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक चेतना और भविष्य की सुरक्षा है। जब जंगल जीवंत होंगे, नदियाँ निर्मल होंगी और वन्यजीव सुरक्षित होंगे, तभी भारत समृद्ध बनेगा। आइए, इस पावन दिवस पर हम सब मिलकर प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करें और संकल्प लें प्रकृति की रक्षा ही मानवता की रक्षा है, वन्यजीवों की सुरक्षा ही भविष्य की सुरक्षा है।
03/03/2026
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03/03/2026
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03/03/2026
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03/03/2026
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