
अजीत मिश्रा (खोजी)
अराजपत्रित कर्मचारी अधिकारी & राजपत्रित
।। छुट्टियाँ नहीं, आज्ञाकारिता चाहिए: पुलिस बल के भीतर चलता अनुशासनवादी शोषण। अंग्रेजी सिस्टम 1861 ।।
पुलिस विभाग में अनुशासन, सेवा‑भाव और त्याग को सबसे ऊँचा मूल्य बताया जाता है। लेकिन इसी अनुशासन के नाम पर सिपाही और दरोगा के वैधानिक अधिकारों को जिस तरह दबाया जाता है, वह अब एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि संस्थागत शोषण का रूप ले चुका है। छुट्टियाँ—जो किसी भी कर्मचारी की शारीरिक और मानसिक आवश्यकता हैं—यहाँ अधिकार नहीं, बल्कि संदेह और दंड का कारण बना दी गई हैं।
यह लेख पुलिस बल के भीतर चल रहे उसी अदृश्य तंत्र की पड़ताल है, जहाँ काम नहीं बल्कि आज्ञाकारिता प्राथमिक शर्त बन चुकी है।
— भाईयो समझने की कोशिश करो किसान और जवान भी ईमानदार होते हैं इनको समझो।
1. CL (Casual Leave): अधिकार से नियंत्रण तक
नियमों के अनुसार सिपाही और दरोगा को साल में 30 CL मिलनी चाहिए। काग़ज़ पर यह अधिकार है, लेकिन व्यवहार में: — अधिकांश कर्मचारी साल में 10–15 CL से अधिक नहीं ले पाते। 20 CL लेना भी अपवाद माना जाता है। दिसंबर माह में CL लगभग निषिद्ध हो जाती है—चुनाव, त्योहार, वीवीआईपी ड्यूटी और वर्षांत दबाव का बहाना देकर। CL को अधिकार की तरह नहीं, बल्कि कमान संभालने का औज़ार बना दिया गया है। छुट्टी माँगना अक्सर यह संकेत मान लिया जाता है कि कर्मचारी ‘पूरी तरह आज्ञाकारी’ नहीं है।।
2. CL में आने वाले Gazetted Holiday: आदेशों की खुली अवहेलना।
सरकारी आदेश स्पष्ट है:— CL के बीच आने वाला Gazetted Holiday, CL में नहीं गिना जाएगा।
इसके बावजूद ज़मीनी हकीकत यह है कि:—
👉 CL काट ली जाती है
👉 Gazetted Holiday का लाभ जानबूझकर नहीं दिया जाता।
यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सचेत आदेश‑उल्लंघन है। सवाल यह है कि जब सरकारी आदेश सिपाही‑दरोगा पर बाध्यकारी हैं, तो वही आदेश अधिकारियों पर क्यों लागू नहीं होते?
3. EL (Earned Leave): अधिकार से ‘विशेष अनुमति’ तक।
सिपाही‑दरोगा को साल में 31 EL का प्रावधान है। लेकिन व्यवहार में:– EL को सामान्य विश्राम या मानसिक रिकवरी के लिए नहीं माना जाता।
इसे केवल:— अपनी शादी, माता‑पिता या परिवार की गंभीर बीमारी। या किसी तथाकथित “विशेष परिस्थिति” तक सीमित कर दिया गया है।जितनी EL आवश्यक हो, उतनी पूरी भी नहीं दी जाती।
यह रवैया स्पष्ट करता है कि व्यवस्था सिपाही‑दरोगा को इंसान नहीं, हमेशा उपलब्ध संसाधन मानकर चलती है।
4. EL में पड़ने वाले Gazetted Holiday पर वेतन कटौती
नियमों के अनुसार:— EL के दौरान पड़ने वाला Gazetted Holiday न EL से कटेगा, न वेतन से।
लेकिन व्यवहार में: छुट्टी EL में जोड़ दी जाती है। और कई मामलों में वेतन भी काट लिया जाता है। अर्थात: > छुट्टी भी गई, वेतन भी गया
यह भूल नहीं, बल्कि दंडात्मक मानसिकता का परिणाम है—बिना किसी अनुशासनहीनता के।
5. मानसिकता का संक्रमण: IPS–PPS से SHO/SO तक
इस व्यवस्था में दोष केवल IPS और PPS स्तर तक सीमित नहीं है। एक गंभीर सच्चाई यह भी है कि ऊपर की मानसिकता नीचे तक उतर जाती है।
SHO/SO, जो स्वयं नॉन‑गैज़ेटेड अधिकारी होता है, अक्सर वही रवैया अपनाने लगता है क्योंकि:— उसका चार्ज सीधे SP या SSP से मिलता है कोई शक हो तो बागी सिपाही से सम्पर्क करे अच्छी तरह समझा दूंगा । पोस्टिंग, चार्ज और भविष्य उसी कमांड‑चेन पर निर्भर होता है।
नतीजा यह कि:— SHO/SO नीचे के कर्मचारियों के अधिकारों का रक्षक बनने की बजाय। ऊपर की आज्ञाओं को जस‑का‑तस लागू करने वाला माध्यम बन जाता है। इस प्रक्रिया में अन्याय केवल ऊपर से थोपा नहीं जाता, बल्कि नीचे के स्तर पर उसी के हाथों से लागू कराया जाता है, जो स्वयं उस तंत्र का हिस्सा है।
6. दोहरे मानदंड: ऊपर सुविधा, नीचे संदेह
एक तरफ अधिकारी वर्ग:—
👉 बिना सवाल छुट्टियाँ लेता है।
👉 Gazetted Holiday का पूरा लाभ उठाता है।
👉 वेतन में कोई कटौती नहीं झेलता।
दूसरी तरफ फील्ड में तैनात सिपाही‑दरोगा:
जिसकी छुट्टी शक की नज़र से देखी जाती है। जिसके अधिकार ‘ड्यूटी’ के नाम पर टाले जाते हैं। और जिसका वेतन काटने में नियमों की भी परवाह नहीं की जाती। यह स्थिति अनुशासन नहीं, संस्थागत भेदभाव को उजागर करती है।
पुलिस प्रणाली मे बहुत कुछ दिखता है और होता नहीं,जो होता है वह दिखता नहीं । बागी बनो गलत का खुलकर विरोध करना जरुरी है।
7. “ड्यूटी प्रभावित होगी”—एक खोखला तर्क
हर सवाल के जवाब में एक ही तर्क दिया जाता है: > “छुट्टी देंगे तो ड्यूटी प्रभावित होगी”
यदि यह तर्क सही होता, तो:
⭐अन्य सरकारी विभागों में यह समस्या क्यों नहीं है?
⭐ अधिकारी वर्ग की छुट्टियों से ड्यूटी क्यों नहीं बिगड़ती। सच्चाई यह है कि ड्यूटी प्रभावित होती है कुप्रबंधन से, न कि कर्मचारी के वैध अधिकार देने से।
निष्कर्ष: यह अनुशासन नहीं, आज्ञाकारिता की माँग है। पुलिस बल के भीतर छुट्टियों से जुड़ी यह पूरी व्यवस्था यह साफ़ करती है कि यहाँ समस्या छुट्टियों की नहीं, बल्कि सोच की है। जब तक: CL और EL को वास्तविक अधिकार नहीं माना जाएगा।Gazetted Holiday से जुड़े सरकारी आदेशों का पालन अनिवार्य नहीं होगा और कमांड‑चेन में फैली मनमानी पर जवाबदेही तय नहीं की जाएगी तब तक अनुशासन के नाम पर केवल एक ही अपेक्षा रहेगी—आज्ञाकारिता।
एक ऐसी पुलिस व्यवस्था जो अपने ही कर्मचारियों को विश्राम, सम्मान और अधिकार नहीं दे सकती, उससे जनता के प्रति न्यायपूर्ण और संवेदनशील होने की उम्मीद करना आत्मविरोधी है।
















