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भू-गर्भ जल का हो रहा दोहन, प्रतिबंध के बाबजूद धड़ल्ले से हो रही साठा धान की रोपाई

शाहजहाँपुरIMG 20240502 WA0010 1शाहजहाँपुर/बंडा।कृषि क्षेत्र में अग्रणी जिले की पुवायाँ तहसील को मिनी पंजाब कहा जाता है जिसमें किसान बड़े पैमाने पर गेहूं, धान और गन्ने की पैदावार करते है। इसके साथ ही कुछ किसानों द्वारा फरवरी में धान की नर्सरी डालकर ग्रीष्मकालीन साठा (चाइनीज धान) की खेती की जाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक साठा धान की फसल में उर्वरकों, कृषि रक्षा रसायनों की अधिकता तो होती ही है, चौथे-पांचवें दिन सिंचाई के लिए पानी की भी जरूरत होती है।

मृदा उर्वरता को संरक्षित रखने के लिए साठा धान की खेती भूमि एवं पर्यावरण के लिहाज से अनुकूल नहीं है। इधर साठा धान के लगाने से भू-गर्भ जल स्तर के गिरने एवं पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्परिणामों को दृष्टिगत रखते हुए कृषि विभाग द्वारा जिले में साठा धान की खेती को प्रतिबंधित कर दिया है लेकिन कुछ किसान सरकार के आदेशों को नजर अंदाज कर साठा धान लगाकर जल का दोहन कर रहे है ।इस फसल के उत्पादन से किसानों को त्वरित लाभ तो दिखाई दे रहा है, लेकिन इसके दूरगामी परिणामों से अनभिज्ञ किसान इसके उत्पादन पर जोर देते आ रहे हैं। बंडा ब्लॉक के पोहकरपुर, सिकरहनिया, बिलंदपुर सुंदरपुर, अजोधापुर, अखत्यारपुर धौकल, भांभी, बरीबरा, गहलुईया, नवदिया बंकी, देवकली,पिपरिया घासी आदि गांवों मे बड़े स्तर पर किसानों ने धान की रोपाई की हैं ।

*60 दिनों में तैयार हो जाती है फसल*

दरसअल साठा धान की फसल 60 दिनों में तैयार हो जाती है, लेकिन इसको तैयार करने के लिए रोजाना पानी की जरूरत पड़ती है। किसान लगातार 60 दिनों तक इस फसल में पानी डालते हैं। साठा धान की पौध फरवरी में ही डलना शुरू हो जाती है। करीब 30 दिन में पौध तैयार हो जाती है।इसके बाद किसान सरसो, गेंहू काटकर, गन्ने की पेड़ी के खेतों में साठा धान की फसल मात्र 60 दिन में तैयार कर लेते हैं।इसके बाद तुरंत उसी खेत में दोबारा धान की दूसरी प्रजाति की फसल तैयार कर ली जाती है।

*साठा धान का उत्पादन बड़ी वजह*

जिले में करीब एक दशक पूर्व कुछ बंगाली विस्थापितों ने साठा धान की पैदावार शुरू की थी। कम लागत देख तराई के सिख फार्मरों ने भी इसकी पैदावार करनी शुरू कर दी। अब इसका रकबा साल दर साल बढ़ता जा रहा है।

मुख्य धान की फसल से एक एकड़ में करीब 20 क्विंटल, जबकि साठा धान करीब 35 से 40 क्विंटल पैदा होता है, लेकिन यह मुनाफा अगले दस सालों में काफी महंगा साबित हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक साठा फसल में हर तीसरे दिन पानी की खपत होने से भूगर्भ जल का खासा दोहन होता है।

पत्राचार के माध्यम से जिला कृषि अधिकारी को अवगत कराया है। बाकी सर्वेक्षण करा कर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

संजय पाठक

उप जिलाधिकारी पुवायां

 

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