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“ड्यूटी से ‘नदारद’ डॉक्टर, न्याय के लिए ‘लाचार’ जनता: आखिर कब तक चलेगी यह मनमानी?”

"बस्ती का स्वास्थ्य विभाग वेंटिलेटर पर! डॉक्टरों की 'लापरवाही' ने तोड़ा मरीजों का दम।"

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। सिस्टम बीमार है या संवेदनाएं? ड्यूटी से गायब डॉक्टर और दम तोड़ती न्याय की उम्मीद।।

शुक्रवार 23 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती। सरकारी अस्पतालों की सफेद दीवारों के पीछे लापरवाही का जो खेल चल रहा है, वह अब किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में जिला महिला अस्पताल से आई खबर ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कुछ डॉक्टरों के लिए ‘सेवा’ शब्द महज एक कागजी औपचारिकता बनकर रह गया है।

💫लापरवाही की हद: जब रक्षक ही बने भक्षक

अस्पताल के सीएमएस डॉ. अनिल कुमार द्वारा सीएमओ को लिखा गया पत्र व्यवस्था के गाल पर एक तमाचा है। मामला ‘मेडिको-लीगल’ जैसे संवेदनशील कार्य से जुड़ा है। जब पुलिस किसी पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए अस्पताल लाती है, तो वह डॉक्टर की मेज पर घंटों इंतजार करता है। लेकिन अफसोस! रोस्टर में ड्यूटी होने के बावजूद डॉ. जाह्नवी कसौधन (हर्रैया महिला अस्पताल) और डॉ. आयुषी दुबे (सल्टौआ सीएचसी) जैसे चिकित्सक अपनी जिम्मेदारी से नदारद पाए गए।

यह केवल एक ‘ड्यूटी’ मिस करने का मामला नहीं है, बल्कि उस पीड़ित के घावों के साथ मजाक है जो न्याय की आस में अस्पताल की चौखट पर खड़ा रहता है। मेडिको-लीगल रिपोर्ट में देरी का मतलब है—न्याय में देरी।

💫बहानेबाजी और वीआईपी कल्चर

सरकारी तनख्वाह और सुविधाओं का आनंद लेने वाले ये चिकित्सक आखिर जनता के प्रति इतने उदासीन क्यों हैं? क्या प्रशासन का डर खत्म हो चुका है या फिर ऊंचे रसूख के कारण इन्हें कार्रवाई की परवाह नहीं? पत्र भेजे जा रहे हैं, सिफारिशें हो रही हैं, लेकिन धरातल पर बदलाव शून्य है। जब सीएचसी और जिला अस्पताल के डॉक्टर ही ड्यूटी से कन्नी काटेंगे, तो आम आदमी किसके भरोसे रहेगा?

💫सिर्फ सिफारिश नहीं, सख्त कार्रवाई की जरूरत

सीएमओ डॉ. राजीव निगम ने कार्रवाई की बात तो कही है, लेकिन क्या यह केवल एक और फाइली कार्रवाई बनकर रह जाएगी? जरूरत इस बात की है कि:-

⭐ऐसे डॉक्टरों पर न केवल विभागीय कार्रवाई हो, बल्कि उनके वेतन में कटौती और सर्विस रिकॉर्ड में ‘ब्लैक मार्क’ दर्ज किया जाए।

⭐मेडिको-लीगल कार्य में बाधा डालने को ‘कर्तव्य की अवहेलना’ के साथ-साथ ‘न्याय प्रक्रिया में बाधा’ माना जाए।

बस्ती का स्वास्थ्य विभाग यदि अपनी साख बचाना चाहता है, तो उसे इन ‘लापरवाह सफेदपोशों’ पर नकेल कसनी होगी। जनता डॉक्टरों को भगवान का रूप मानती है, लेकिन अगर भगवान ही ड्यूटी से नदारद रहने लगे, तो फिर इस सिस्टम का अंत निश्चित है।

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