
निवाड़ी । अक्सर यह कहा जाता है कि खेती अब फायदे का सौदा नहीं रही, लेकिन निवाड़ी जिले के ग्राम नेगुआ की रहने वाली महिला किसान श्रीमती प्रभा देवी ने इस धारणा को पूरी तरह गलत साबित कर दिया है।
मात्र 744 वर्ग मीटर भूमि पर वैज्ञानिक एवं प्राकृतिक पद्धति से विकसित किए गए “नैनो बगीचे” के माध्यम से उन्होंने न केवल अपनी आजीविका को सशक्त बनाया, बल्कि आत्मनिर्भरता की एक प्रेरक कहानी भी गढ़ी है।
संघर्ष से सफलता तक का सफर
श्रीमती प्रभा देवी एवं उनके पति श्री धर्मेंद्र के पास कुल 1.5 एकड़ कृषि भूमि है। पहले वे पारंपरिक खेती करते थे, लेकिन मौसम की अनिश्चितता और बढ़ती लागत के कारण अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा था।
आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर हो गई थी कि परिवार का भरण-पोषण करने के लिए उनके पति को मजदूरी हेतु बाहर जाना पड़ता था।
वर्ष 2023 में प्रभा देवी के जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया, जब उनके गाँव में सृजन संस्था के सहयोग से “जय माँ देवी महिला उत्पादक समूह” का गठन हुआ। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें आधुनिक खेती की तकनीकों तथा नैनो बगीचा (छोटा बागान) अवधारणा की जानकारी मिली।
वैज्ञानिक तकनीक से बदली तस्वीर
सृजन संस्था की तकनीकी टीम के मार्गदर्शन में प्रभा देवी ने अपनी भूमि के एक छोटे से हिस्से (744 वर्ग मीटर) में अमरूद का बाग विकसित किया।
उन्होंने 3×4 मीटर की दूरी पर
L-49 किस्म के 40 पौधे
ताइवान पिंक किस्म के 20 पौधे
रोपित किए।
पूरे बागान में रसायनों के स्थान पर पूर्णतः प्राकृतिक खेती अपनाई गई, जिससे लागत कम हुई और उत्पाद की गुणवत्ता बेहतर हुई। संस्था द्वारा उन्हें अन्य गाँवों के सफल बागानों का भ्रमण भी कराया गया, जिससे उनका आत्मविश्वास और अधिक बढ़ा।
कम लागत, बड़ा मुनाफा
मेहनत और तकनीकी ज्ञान का परिणाम इस वर्ष अमरूद की बंपर पैदावार के रूप में सामने आया। बाजार की मांग के अनुसार सही समय पर
550 किलोग्राम अमरूद बिक्री से ₹22,000 की आय हुई।
इसके साथ ही, अमरूद के पौधों के बीच खाली जगह का सदुपयोग करते हुए उन्होंने
मूली और पत्ता गोभी की खेती की,
जिससे उन्हें ₹8,500 का अतिरिक्त लाभ प्राप्त हुआ।
👉 इस प्रकार, केवल एक छोटे से भू-भाग से कुल ₹30,500 की आय अर्जित कर उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया।
बनीं महिला सशक्तिकरण की प्रेरणा
आज श्रीमती प्रभा देवी न केवल आत्मनिर्भर महिला किसान हैं, बल्कि अपने गाँव की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत और रोल मॉडल भी बन चुकी हैं। उनकी सफलता यह सिद्ध करती है कि यदि कम जमीन पर भी सही तकनीक, वैज्ञानिक सोच और प्राकृतिक खेती को अपनाया जाए, तो खेती आजीविका सुधार का सबसे सशक्त माध्यम बन सकती है।





