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बिजली नियामक आयोग के नए निर्देश से सौर ऊर्जा ग्राहकों में नाराजगी, ‘प्रोत्साहन’ से ‘ग्रीड खर्च वसूली’ की ओर बढ़ा सफर

समीर वानखेडे ब्यूरो चीफ:
केंद्र सरकार के सौर ऊर्जा मिशन में मिल रहे प्रोत्साहन और सब्सिडी को देखकर आम नागरिकों, व्यापारियों और उद्योजकों ने सोलर प्लांट में बड़ी पूंजी लगाई थी। लेकिन महाराष्ट्र राज्य विद्युत नियामक आयोग द्वारा लगाई गई नई शर्तों ने सौर ग्राहकों को झटका दे दिया है। राज्य में अब सौर ऊर्जा का सफर ‘प्रोत्साहन’ से ‘ग्रीड खर्च वसूली’ की तरफ मुड़ गया है, जिसका अतिरिक्त बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। इससे राज्य सरकार को भी सौर ग्राहकों की भारी नाराजगी झेलनी पड़ सकती है।

भारत में विकास की रफ्तार के साथ ऊर्जा की मांग तेजी से बढ़ी। इसी को देखते हुए केंद्र सरकार ने गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने के लिए सोलर मिशन शुरू किया। योजना के तहत नागरिक, व्यापारी और उद्योग जगत सोलर पैनल लगाकर बिजली बनाएंगे, खुद इस्तेमाल करेंगे और अतिरिक्त बिजली वितरण कंपनियों के ग्रिड में डालकर सरकारी दर पर पैसा भी कमाएंगे। लोगों को आकर्षित करने के लिए सरकार ने सब्सिडी दी और बैंकों के जरिए सस्ते ब्याज पर लोन की सुविधा भी उपलब्ध कराई। देशभर के सौर ग्राहकों ने इस मिशन को जबरदस्त रिस्पॉन्स दिया। लेकिन अब नियामक आयोग के नए फैसले ने इन्हीं ग्राहकों को बड़ा झटका दिया है।

*ग्रीड सपोर्ट चार्ज: अब खुद की बिजली पर भी देना होगा शुल्क*
महाराष्ट्र सरकार ने शुरू में सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए ग्रिड इस्तेमाल पर कोई शुल्क नहीं लगाया था। लेकिन अब नियामक आयोग के आदेश के मुताबिक ग्राहकों को ‘ग्रीड सपोर्ट चार्ज’ देना होगा। इसके तहत सोलर प्रोजेक्ट से बनने वाली बिजली पर, यहां तक कि खुद इस्तेमाल की जाने वाली बिजली पर भी शुल्क लगेगा।

यह फैसला तकनीकी से ज्यादा नीतिगत बदलाव का साफ संकेत है। इसका मतलब है कि अब ग्रिड से आजाद होकर ऊर्जा इस्तेमाल करने का आइडिया व्यावहारिक नहीं रहा। उल्टा, ग्रिड इस्तेमाल करने पर ग्राहक को ही खर्च उठाना पड़ेगा।

*बैंकिंग चार्ज और समय में कटौती से बढ़ेगी मुश्किल*
इसके साथ ही अतिरिक्त बची बिजली के ‘बैंकिंग चार्जेस’ भी बढ़ा दिए गए हैं। साथ ही बैंकिंग के लिए मिलने वाले समय पर पाबंदी लगा दी गई है, जिससे सौर ऊर्जा की फ्लेक्सिबिलिटी घट जाएगी।

दिन में बनी बिजली को रात में इस्तेमाल करने की सुविधा सीमित होने से सोलर प्रोजेक्ट की उपयोगिता अब सिर्फ ‘रियल टाइम’ इस्तेमाल तक सिमट जाएगी। नतीजतन, बैटरी स्टोरेज जैसे महंगे विकल्पों की जरूरत पड़ेगी, जो सौर प्रोजेक्ट्स का अर्थशास्त्र और उलझा देंगे।

आयोग ने नेट मीटरिंग की व्यवस्था तो बरकरार रखी है, लेकिन अतिरिक्त बिजली के लिए तय की गई कम दर ‘उत्पादन की जगह इस्तेमाल’ वाले मॉडल को बढ़ावा देती है। यानी सोलर प्लांट से मुनाफा कमाने के बजाय सिर्फ अपने इस्तेमाल के लिए बिजली बनाना ही फायदेमंद रह गया है।

इसके अलावा दिन में सस्ती और पीक आवर में महंगी बिजली के रेट तय कर आयोग ने ग्राहकों को अपना इस्तेमाल का तरीका बदलने का संकेत भी दिया है। इससे सौर ऊर्जा क्षेत्र में निवेश की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। इंडस्ट्री में बढ़ती लागत और नए प्रोजेक्ट्स पर पाबंदियां, लंबी अवधि में चिंताजनक साबित हो सकती हैं।

*राज्य विद्युत नियामक आयोग के नए निर्देश*
– *ग्रीड सपोर्ट चार्जेस लागू*
– *बैंकिंग चार्जेस में 2% से बढ़ाकर 8% तक की बढ़ोतरी*
– *बिजली बैंकिंग के लिए उपलब्ध समय 17 घंटे से घटाकर 8 घंटे किया*
– *नेट मीटरिंग जारी, लेकिन शर्तों के साथ*
– *अतिरिक्त सौर बिजली के रेट में कटौती (2.82 रुपये प्रति यूनिट)*

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