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“बस्ती वन विभाग में ‘अंगद’ हुए कर्मचारी: 2008 से एक ही जगह जमाए हैं पैर, शासनादेश की उड़ा रहे धज्जियां”

"वन विभाग में रसूख का बोलबाला: उड़नदस्ते के 'खास' सिपाहियों पर मेहरबान अफसर, तबादला नीति पड़ी ठंडे बस्ते में"

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। शासनादेश को ठेंगा दिखा रहे बस्ती वन विभाग के ‘अंगद’, सालों से जमे कर्मचारियों पर मेहरबान अधिकारी।।

शुक्रवार 16 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती। उत्तर प्रदेश सरकार एक ओर जीरो टॉलरेंस की नीति और पारदर्शी स्थानांतरण प्रक्रिया का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं जनपद बस्ती का वन विभाग शासनादेश की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। जिले में वन विभाग के कुछ कर्मचारी ‘अंगद’ की तरह पैर जमाए बैठे हैं, जिनका रसूख इतना बढ़ चुका है कि जिला प्रशासन और आला अधिकारी भी उनके आगे बेबस नजर आ रहे हैं।

💫2008 से एक ही जगह ‘आसन’ जमाए बैठे हैं खास कर्मचारी

विभागीय सूत्रों की मानें तो वन विभाग के उड़ाका दल में तैनात राजकुमार जैसे कर्मचारी पिछले कई सालों से एक ही जिले में अपनी जड़ें जमाए हुए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि ये कर्मचारी वर्ष 2008 से लगातार इसी क्षेत्र में टिके हुए हैं। नियमतः तीन से पांच वर्षों में होने वाले तबादलों का इन पर कोई असर नहीं पड़ता। ऐसा प्रतीत होता है कि इनके लिए विभाग की नियमावली कोई मायने नहीं रखती।

अधिकारियों का मौन समर्थन: मजबूरी या ‘आर्थिक लाभ’ का मोह?

क्षेत्र में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर इन कर्मचारियों में ऐसी क्या खास बात है कि बड़े-बड़े अधिकारी इनके सामने नतमस्तक हैं। सवाल यह उठता है कि:

क्या वन विभाग के आला अधिकारी इन कर्मचारियों के रसूख के आगे विवश हैं?

क्या यह केवल कार्य के प्रति निष्ठा है या फिर इसके पीछे किसी बड़े आर्थिक लाभ का खेल चल रहा है?

बार-बार उठते सवालों के बावजूद अधिकारियों का मौन समर्थन कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की ओर इशारा कर रहा है।

“जब सरकार का स्पष्ट निर्देश है कि एक ही पटल या जनपद में लंबे समय तक जमे कर्मचारियों का स्थानांतरण किया जाए, तो बस्ती वन विभाग में इन ‘खास’ चेहरों पर मेहरबानी क्यों? क्या इन कर्मचारियों के बिना विभाग पंगु हो जाएगा?”

💫रसूख के आगे बौना साबित हो रहा सिस्टम

बस्ती वन विभाग का यह पूरा मामला अब जनचर्चा का केंद्र बन चुका है। स्थानीय लोगों और सूत्रों का कहना है कि लंबे समय तक एक ही जगह टिके रहने से इन कर्मचारियों का एक मजबूत और संदिग्ध नेटवर्क तैयार हो जाता है, जो विभागीय कार्यों की शुचिता को प्रभावित करता है। अब देखना यह है कि क्या शासन इन ‘अंगद के पैरों’ को उखाड़ने का साहस जुटा पाता है या फिर भ्रष्टाचार की यह बेल इसी तरह फलती-फूलती रहेगी।

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