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“एंटी करप्शन की फजीहत, दरोगा की मौज: सिस्टम के छेद से बाहर निकले धनंजय भाई!”

"रिश्वत की नई परिभाषा: अब नोट जेब में नहीं, फाइल में रखवाइए और जमानत पाइए!"

अजीत मिश्रा (खोजी)

।।अंधा कानून, गजब वकील और ‘फाइल’ में दबा भ्रष्टाचार।।

​कहते हैं कि कानून की नजर में सब बराबर होते हैं, लेकिन हालिया घटनाओं को देखकर लगता है कि कानून की नजरें शायद ‘फाइल’ के पन्नों में उलझ कर रह गई हैं। वह पुराना फार्मूला तो आपको याद ही होगा— “भले ही सौ अपराधी छूट जाएं, पर एक बेगुनाह को सजा नहीं होनी चाहिए।” वाकई, जिसने भी यह जुमला बनाया होगा, वह आज के हालात देखकर अपनी पीठ खुद थपथपा रहा होगा।

हाथ नहीं, ‘फाइल’ हुई मालामाल

​ताजा मामला हमारे ‘तेज-तर्रार’ दरोगा धनंजय सिंह जी का है। एंटी करप्शन विभाग वाले बड़ी शान से सीना फुलाए घूम रहे थे कि ₹2 लाख के साथ रंगे हाथ दबोच लिया है। लेकिन साहब, यहाँ तो बाजी ही पलट गई। वकील साहब की दलील सुनकर तो बड़े-बड़े कानूनविदों ने दांतों तले उंगली दबा ली होगी। दलील दी गई कि पैसा दरोगा जी की जेब से नहीं, बल्कि मेज पर रखी ‘फाइल’ से मिला है।

​वाह! क्या गजब का तर्क है। अब फाइल किसकी थी, फाइल के हाथ-पांव थे क्या कि वह खुद रिश्वत मांग ले? लेकिन कानून तो सबूत मांगता है, और सबूत कहता है कि दरोगा जी का दामन तो साफ है, बस फाइल ही थोड़ी ‘वजनी’ हो गई थी। वकील साहब की इस बुद्धिमत्ता को सलाम! ऐसे मेधावी लोगों की जगह तो हाई कोर्ट की कुर्सी पर होनी चाहिए, ताकि भविष्य में जब किसी ‘खास’ के नौकर के घर से करोड़ों बरामद हों, तो उसे भी ‘लावारिस संपत्ति’ घोषित किया जा सके।

सिस्टम की ‘फाइल’ में दबा इंसाफ: ₹2 लाख का खेल और अंधा कानून!

धन्य है हमारा सिस्टम और धन्य हैं इसके रखवाले! जिस देश में न्याय की मूर्ति की आंखों पर पट्टी बंधी हो, वहां अगर ‘रंगे हाथ’ पकड़ा गया दरोगा साफ-सुथरा निकल जाए, तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए। दरोगा धनंजय सिंह के मामले में जो ‘कानूनी चमत्कार’ हुआ है, उसने एक बात साफ कर दी है कि अगर आपके पास ‘दिमाग’ और ‘दमदार वकील’ है, तो रिश्वत के नोट भी आपके नहीं, बल्कि कागजों के सगे हो जाते हैं।

वकील साहब की ‘जादुई’ दलील

अदालत में दी गई वकील साहब की दलील तो कानून की किताबों में स्वर्ण अक्षरों से लिखी जानी चाहिए। तर्क दिया गया कि— “पैसा फाइल से बरामद हुआ, दरोगा की जेब से नहीं।” वाह! क्या बात है। मतलब अब रिश्वत का पैसा खुद चलकर फाइल में बैठ गया था? या फिर फाइल को ही ₹2 लाख की सख्त जरूरत थी?

ऐसी कुशाग्र बुद्धि वाले वकीलों को तो सीधे जजों के पैनल में बैठना चाहिए। आखिर कल को जब किसी बड़े साहब के चपरासी या नौकर के घर से करोड़ों निकलेंगे, तो यही तर्क तो काम आएगा कि— “साहब, पैसा तो नौकर का है, साहब तो गंगा की तरह पवित्र हैं!”

‘एंटी करप्शन’ की फजीहत और दरोगा जी की ‘सतर्कता’

बेचारे एंटी करप्शन वाले! बड़ी तैयारी के साथ जाल बिछाया था, सोचा था कि भ्रष्टाचार की मछली फंसा ली। पर उन्हें क्या पता था कि वे किसी ‘मगरमच्छ’ से टकरा रहे हैं। अब मुंह पर कालिख पुतवा कर बैठे हैं। अरे भाई, आप लोगों को भी समझना चाहिए था, किसी गरीब चपरासी को पकड़ते तो वाहवाही भी मिलती और केस भी टिकता। इतने ‘तेज-तर्रार’ और ‘पहुंच’ वाले दरोगा पर हाथ डालकर अपनी ही फजीहत करवा ली।

वहीं, धनंजय भाई के लिए यह जेल यात्रा एक ‘ट्रेनिंग’ की तरह रही। पहले वो थोड़े लापरवाह थे, खुलेआम नोट थाम लेते थे। अब जमानत से बाहर आकर वो और भी ‘सुसंस्कृत’ और ‘सतर्क’ हो जाएंगे। अब नोट जेब में नहीं, सीधे ‘फाइल’ के जरिए ही वसूल किए जाएंगे। भोलेनाथ की कृपा रही तो जल्दी ही किसी ‘मलाईदार’ थाने में उनकी वापसी होगी, जहाँ वो अपनी इस नई सीखी हुई ‘सतर्कता’ का प्रदर्शन करेंगे।

आम आदमी की मजबूरी, रसूखदारों की मजूरी

यह फैसला उन ईमानदार अधिकारियों के गाल पर तमाचा है जो वाकई सिस्टम को साफ करना चाहते हैं। जब रंगे हाथ पकड़ा जाना भी गुनाह नहीं माना जाएगा, तो फिर डर किसका? अब तो अपराधी भी सीना ठोक कर कहेगा— “साहब, पैसा फाइल में रखा है, हिम्मत है तो मेरा बता कर दिखाओ!”

न्याय की इस जीत पर मिठाई बांटिए! क्योंकि अब साबित हो चुका है कि रिश्वतखोरी अपराध नहीं, बस ‘फाइल मैनेजमेंट’ का एक हिस्सा है। आम आदमी बस तमाशा देखे और टैक्स भरता रहे, ताकि सिस्टम के ये ‘शूरवीर’ जमानत पर बाहर आकर फिर से अपनी मलाईदार पारी शुरू कर सकें।

सुधरेंगे दरोगा जी, पर तरीका…

​धनंजय भाई अब जमानत पर बाहर हैं। भोलेनाथ की कृपा रही तो जल्द ही किसी मलाईदार चौकी या थाने का चार्ज भी संभाल लेंगे। वैसे, यह ‘झटका’ उनके लिए जरूरी था। पहले वह थोड़े बेअंदाज थे, खुलेआम बिना डरे गांधी जी के नोटों का स्वागत करते थे। अब उम्मीद है कि वह सुधर जाएंगे। सुधार इस बात में नहीं कि रिश्वत लेना छोड़ देंगे, बल्कि इसमें कि अब ‘सतर्कता’ बरतेंगे। अगली बार शायद फाइल की जगह कोई और जादुई कोना ढूंढ लिया जाए।

एंटी करप्शन की किरकिरी

​सबसे करारा तमाचा तो एंटी करप्शन विभाग के मुंह पर पड़ा है। गए थे शेर का शिकार करने और खुद ही मेमना बनकर लौट आए। अरे भाई, आपको क्या जरूरत थी इतने रसूखदार दरोगा पर हाथ डालने की? किसी छोटे-मोटे चपरासी या अदने से क्लर्क को पकड़कर अपना कोरम पूरा कर लेते, तो शायद आज यह बेइज्जती न झेलनी पड़ती। अब बैठिए और अपनी हार का जश्न मनाइए, क्योंकि सिस्टम में ‘फाइल’ का वजन आपसे कहीं ज्यादा है।

बधाई हो सिस्टम को, बधाई हो उन वकीलों को और सलाम है उस न्याय को, जहाँ अपराधी नहीं, बल्कि सबूतों की ‘लोकेशन’ तय करती है कि गुनाह हुआ है या नहीं। आम आदमी तो बस यही कह सकता है— साहब, अगली बार रिश्वत जेब में नहीं, फाइल में ही दीजिएगा!

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