उत्तर प्रदेशबस्ती

प्रशासन के ताले, ‘अमृत’ का खेल: किसके संरक्षण में चल रहा है सील्ड अस्पताल?

सरकारी सील बनी 'शो-पीस': अमृत हॉस्पिटल के आगे बौना हुआ कानून! सीएमओ साहब! क्या अस्पताल की सील सिर्फ कागजों की शोभा बढ़ाने के लिए है?

अजीत मिश्रा (खोजी)

सील के ताले बेअसर: कानून को ठेंगा दिखाकर फिर धड़ल्ले से चल रहा ‘अमृत हॉस्पिटल’

  • जनता की जान से खिलवाड़: सील होने के बाद भी अमृत हॉस्पिटल का अवैध संचालन जारी।
  • व्यवस्था पर सवाल: सील्ड अमृत हॉस्पिटल में फिर भर्ती हो रहे मरीज, क्या प्रशासन सो रहा है?
  • अमृत हॉस्पिटल मामला: विभाग की ‘जांच’ का इंतज़ार या फिर रसूख के आगे घुटने टेकती व्यवस्था?

बस्ती: क्या जनपद के स्वास्थ्य महकमे और स्थानीय प्रशासन की साख ‘अमृत हॉस्पिटल’ के बंद तालों में कैद हो गई है? या फिर इन तालों के पीछे कोई ऐसी अदृश्य चाबी है, जो कानून के हर पहरे को बौना साबित कर रही है? यह सवाल आज बस्ती के हर उस नागरिक की जुबान पर है, जो मुंडेरवा थाना क्षेत्र के बस्ती-मुंडेरवा मार्ग स्थित अमृत हॉस्पिटल के ‘पुनर्जन्म’ को अपनी आँखों से देख रहा है।

​कागजों पर ‘सील’, धरातल पर ‘खेल’

​करीब दो माह पूर्व इस अस्पताल में एक महिला की मौत के बाद जो तांडव हुआ था, वह अभी लोगों की यादों से मिटा भी नहीं है। प्रशासन ने आनन-फानन में अस्पताल को सील किया, मुंडेरवा थाने में गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज हुए और दावे किए गए कि अब बिना जांच और अनुमति के यहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा। लेकिन, आज तस्वीर कुछ और ही बयां कर रही है। सील लगा अस्पताल फिर से गुलजार है, मरीज भर्ती हो रहे हैं और इलाज के नाम पर फिर से वही खेल खेला जा रहा है, जिसने कभी एक परिवार की खुशियां उजाड़ दी थीं।

​सीएमओ का बयान: जिम्मेदारी का ‘खेल’ या व्यवस्था की ‘लाचारी’?

​जब इस बाबत मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. राजीव निगम से सवाल किया गया, तो उनका जवाब बेहद चौंकाने वाला था। उन्होंने स्पष्ट कहा कि “अस्पताल संचालन के लिए विभाग से कोई आदेश जारी नहीं हुआ है।” सवाल यह है कि यदि कोई आदेश नहीं है, तो फिर अस्पताल का संचालन कौन कर रहा है?

​सीएमओ साहब की यह टिप्पणी कि “मामले की जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी,” व्यवस्था के खोखलेपन को दर्शाती है। यदि अवैध संचालन हो रहा है, तो जांच की जरूरत किसे है? क्या अस्पताल के गेट पर टंगे ताले या वहां हो रही गतिविधियाँ विभाग को दिखाई नहीं दे रही हैं? या फिर यह सिर्फ एक रटा-रटाया बयान है, जिसका उद्देश्य सिर्फ मीडिया के सवालों से पीछा छुड़ाना है?

​सवालिया निशान

  • प्रशासन की चुप्पी क्यों? मुंडेरवा पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की मिलीभगत के बिना क्या सील हुए अस्पताल का ताला खुलना संभव है?
  • जनता की जान का मोल कौन चुकाएगा? अगर फिर कोई बड़ी घटना होती है, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा—अवैध संचालक या आंखें मूंदे बैठा प्रशासन?
  • भयमुक्त संचालन कैसे? बिना किसी सक्षम आदेश के अगर अस्पताल चल रहा है, तो यह सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था को सीधी चुनौती है।

​अमृत हॉस्पिटल का फिर से संचालित होना प्रशासन के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। यह मामला केवल एक अस्पताल के संचालन का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर लगे उस कलंक का है, जो यह साबित कर रहा है कि बस्ती में ‘रसूख’ के आगे कानून हमेशा बौना साबित होता है।

​अब देखना यह है कि प्रशासन इस बार कोई ठोस कार्रवाई करता है या फिर ‘जांच’ का आश्वासन देकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। जनता अब केवल आश्वासन नहीं, ठोस और सख्त कार्रवाई चाहती है।

क्या आपको लगता है कि स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत के बिना इस तरह का अवैध संचालन संभव है?

।। सूत्रों के हवाले से खबर।।

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