उत्तर प्रदेशबस्ती

अपनों की ही ‘पटकनी’ से बेहाल बस्ती भाजपा, क्या संभल पाएंगे ‘पंकजजी’?

​'पंकजजी' बताइए, 'क्यों' की 'बस्ती' की 'उपेक्षा'? — सत्ता की चौखट पर दम तोड़ती उम्मीदें; 'पंकजजी' बताइए, 'क्यों' की 'बस्ती' की 'उपेक्षा'? बस्ती में भाजपा का अकाल: क्या 2027 में 'सफाया' तय है?

अजीत मिश्रा (खोजी)

पंकजजी’ बताइए, ‘क्यों’ की ‘बस्ती’ की ‘उपेक्षा’? क्या बस्ती भाजपा के लिए सिर्फ एक उपेक्षित कोना बनकर रह गई है?

  • बस्ती की अनदेखी: कैबिनेट में जगह नहीं, गुटबाजी से बिखर रहा संगठन
  • ‘खास’ लोगों की पकड़ और बस्ती की तबाही: नेतृत्व पर उठे गंभीर सवाल

उत्तर प्रदेश की सियासत में ‘बस्ती’ का नाम आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ से रास्ते तो बहुत हैं, लेकिन मंजिल गायब है। अखबार की एक हालिया रिपोर्ट ने भाजपा के भीतर की उस आग को सबके सामने ला दिया है जो पिछले पांच वर्षों से ‘उपेक्षा’ के धुएं में सुलग रही थी। सवाल तीखा है और सीधा पार्टी के कद्दावर चेहरे ‘पंकजजी’ (पंकज चौधरी) से है— आखिर बस्ती की यह अनदेखी क्यों? बस्ती जिले में भाजपा की वर्तमान स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मुख्य चिंता का विषय यह है कि जिले के किसी भी भाजपा नेता को कैबिनेट में जगह मिलने के लायक नहीं समझा गया, जो पिछले पांच वर्षों से चली आ रही ‘उपेक्षा’ को दर्शाता है।

कैबिनेट में ‘शून्य’ प्रतिनिधित्व: एक बड़ा सवाल

​रिपोर्ट के मुताबिक, जिले के भाजपा नेताओं का मनोबल इसलिए टूटा हुआ है क्योंकि उन्हें कैबिनेट में शामिल करने के लायक भी नहीं समझा गया। प्रश्न यह है कि जब गोरखपुर जैसे पड़ोसी जिलों में तीन-तीन उपाध्यक्षों का पद सुशोभित हो सकता है, तो बस्ती में एक भी उपाध्यक्ष क्यों नहीं? क्या बस्ती के नेताओं में योग्यता की कमी है या नेतृत्व उन्हें जानबूझकर हासिए पर धकेल रहा है?

गुटबाजी का जाल और संगठन की बदहाली

​लेख की मानें तो पिछले पांच सालों में बस्ती में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं हुआ है। इसके विपरीत, पार्टी के भीतर ‘पटकनी’ देने और एक-दूसरे को नीचा दिखाने का खेल तेज हुआ है। भाजपाई अब आपस में ही ताल ठोक रहे हैं, जिससे कार्यकर्ताओं के बीच भारी असंतोष है। प्रदेश नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए लेख कहता है कि जो प्रदेश अध्यक्ष अपनी पसंद का उपाध्यक्ष तक नहीं नियुक्त कर सकता, वह चुनाव में जीत की गारंटी कैसे देगा?

​पंकज जी की चुप्पी और ‘खास’ लोगों का बोलबाला

​रिपोर्ट में पंकजजी की कार्यशैली पर कड़े प्रहार किए गए हैं। आरोप है कि उन्होंने ‘बस्ती के रिश्तों’ का ध्यान नहीं रखा। जो लोग खुद को पंकजजी का ‘खास’ मानते हैं, उन्हें भी जनता के बीच कोई स्वीकार्यता नहीं मिल रही है। यह स्थिति आने वाले 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए खतरे की घंटी है। लेख का दावा है कि अगर यही रवैया रहा, तो भाजपा के चारों मौजूदा विधायक, जिनका अस्तित्व ही खतरे में है, चुनाव लड़ने के लिए टिकट तक नहीं जुटा पाएंगे।

​2027: क्या ‘सफाया’ तय है?

​सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बस्ती में भाजपा का ‘सफाया’ होता दिख रहा है। विपक्ष इस आंतरिक कलह का फायदा उठाने के लिए तैयार है। लेख स्पष्ट करता है कि अब समय आ गया है जब पंकजजी को यह तय करना होगा कि वे बस्ती के प्रति जवाबदेह हैं या केवल अपने ‘खास’ लोगों के प्रभाव में काम करेंगे। मौजूदा कैबिनेट टीम की कार्यक्षमता पर भी प्रश्नचिन्ह है, और 2027 के परिणाम ही यह तय करेंगे कि क्या यह टीम पंकज चौधरी के राजनीतिक करियर को आगे ले जाएगी या डुबो देगी।

यह स्थिति पार्टी के भीतर गहराते संकट की ओर इशारा करती है:

  • नेतृत्व पर सवाल: जहाँ गोरखपुर में तीन-तीन उपाध्यक्ष हो सकते हैं, वहीं बस्ती में एक भी उपाध्यक्ष का न होना स्थानीय नेताओं और समर्थकों के लिए निराशाजनक है। यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व जानबूझकर स्थानीय स्तर पर संगठन को कमजोर कर रहा है।
  • गुटबाजी का दौर: पिछले पांच वर्षों में जमीनी स्तर पर कोई सकारात्मक बदलाव नहीं हुआ है, बल्कि गुटबाजी और खींचतान का दौर और तेज हो गया है। नेताओं के बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ मची हुई है।
  • 2027 के लिए खतरे की घंटी: यदि यही स्थिति बनी रही, तो 2027 के चुनावों में भाजपा के लिए बस्ती में अपना अस्तित्व बचाना भी मुश्किल हो जाएगा। वर्तमान कैबिनेट टीम की प्रभावशीलता पर भी संदेह जताया गया है, जिस पर पंकज चौधरी का राजनीतिक भविष्य टिका हुआ है।

बस्ती के भाजपाई अब नेतृत्व से जवाब चाहते हैं। क्या पार्टी समय रहते इस ‘उपेक्षा’ और आंतरिक कलह को सुधार पाएगी, या फिर इसका खामियाजा उसे आने वाले चुनावों में भुगतना पड़ेगा? बस्ती के कार्यकर्ता और आम जनता अब नेतृत्व से ठोस जवाब चाहती है। यह लेख महज एक आलोचना नहीं, बल्कि उस असंतोष का प्रतिबिंब है जो जमीन पर पक रहा है। यदि समय रहते ‘उपेक्षा’ का यह सिलसिला नहीं थमा और स्थानीय संगठन की सुध नहीं ली गई, तो भाजपा को बस्ती में भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

Show More
Back to top button
error: Content is protected !!