उत्तर प्रदेशबस्ती

बस्ती के जिला महिला अस्पताल और हर्रैया के महिला अस्पताल में अवैध रूप से संचालित हो रही पीओसीएल लैब की जांच कमिश्नर वैभव श्रीवास्तव द्वारा शुरू कर दी गई है.

यह मामला सीधे तौर पर सीएमएस और फार्मासिस्ट के मिलीभगत वाले बड़े फर्जीवाड़े को बेनकाब करता है। कमिश्नर की इस सख्त पहल से यह उम्मीद जगती है कि स्वास्थ्य विभाग के इन भ्रष्ट तंत्रों पर लगाम लगेगी और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी।

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती के महिला अस्पतालों में लूट का खेल: कमिश्नर की जांच से खुला ‘पीओसीएल लैब’ का काला सच

  • मशीन दान के नाम पर रीजेंट का अवैध कारोबार करने और बिना अनुबंध के बाजार दर से अधिक कीमत पर रीजेंट खरीदे जाने का गंभीर मामला सामने आया है.
  • ​सरकारी अस्पतालों में तैनात लैब टेक्नीशियनों और फार्मासिस्ट शैलेन्द्र राय की मिलीभगत से निजी फर्म द्वारा अवैध संचालन और वित्तीय अनियमितता का खुलासा हुआ है.
  • ​पड़ोसी जिलों (संतकबीरनगर और सिद्धार्थनगर) में इस तरह की लैब न होने के बावजूद सिर्फ बस्ती के दोनों महिला अस्पतालों में ही पीओसीएल लैब के संचालन पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं.

​बस्ती मंडल में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के नाम पर किस तरह जनता की गाढ़ी कमाई और मरीजों की सेहत से खिलवाड़ हो रहा है, इसका ताजा और सनसनीखेज उदाहरण नवागत कमिश्नर वैभव श्रीवास्तव की सख्त कार्रवाई से सामने आया है। कमिश्नर द्वारा जिला महिला अस्पताल और हर्रैया के महिला अस्पताल में अवैध रूप से संचालित हो रही ‘पीओसीएल लैब’ की जांच शुरू किए जाने के बाद स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मच गया है।

मशीन दान के नाम पर रीजेंट का अवैध साम्राज्य

जांच के दौरान जो तथ्य सामने आए हैं, वे आंखें खोलने वाले हैं। अस्पतालों में यह तर्क दिया गया कि निजी फर्म ने जांच करने वाली मशीनें दान दी हैं। लेकिन नियमों के मुताबिक मशीन दान करने वाली फर्म रीजेंट का कारोबार नहीं कर सकती। अस्पताल सरकार का, मरीज सरकार का और व्यवस्था सरकार की, लेकिन मुनाफा कमाने की पूरी मलाई कोई निजी फर्म काट रही है। सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह है कि जिस फर्म का कोई वैध अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) ही नहीं है, उसे किस अधिकार के तहत बाजार दर से अधिक पर रीजेंट खरीदने की छूट दी गई?

वेतन सरकारी कर्मचारियों का, मलाई काट रहे निजी लोग

सरकारी अस्पतालों में तैनात लैब टेक्नीशियन (एलटी) हर माह सरकार से एक लाख से अधिक का वेतन पा रहे हैं—यानी सरकार अकेले एलटी के वेतन पर हर माह करीब आठ लाख रुपये खर्च कर रही है। इसके बावजूद खून निकालने और जांच का वास्तविक काम करने के बजाय निजी व्यक्तियों द्वारा रीजेंट में हेराफेरी का खेल खेला जा रहा है। महिला अस्पताल में तैनात फार्मासिस्ट शैलेन्द्र राय की भूमिका इस पूरे प्रकरण में बेहद संदेहास्पद रही है, जिन्हें ‘पीओसीएल लैब’ का पार्टनर तक कहा जा रहा है।

सीएमएस के पास जवाब नहीं, पड़ोसी जिलों में सब साफ-सुथरा

कमिश्नर के तीखे सवालों के आगे जब सीएमएस को तलब किया गया, तो उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि लैब का संचालन और वित्तीय भुगतान कैसे और किसके आदेश पर हो रहा है। हैरानी इस बात की है कि बगल के संतकबीरनगर और सिद्धार्थनगर जिलों के महिला अस्पतालों में इस तरह की कोई अवैध पीओसीएल लैब संचालित नहीं होती है, तो फिर सिर्फ बस्ती के ही दोनों महिला अस्पतालों को इस अवैध कारोबार की प्रयोगशाला क्यों बनाया गया?

​यह मामला सीधे तौर पर सीएमएस और फार्मासिस्ट के मिलीभगत वाले बड़े फर्जीवाड़े को बेनकाब करता है। कमिश्नर की इस सख्त पहल से यह उम्मीद जगती है कि स्वास्थ्य विभाग के इन भ्रष्ट तंत्रों पर लगाम लगेगी और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी।

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