
रामगढ़:प्रकृति पर्व कहा जाने वाला कर्मा पर्व रामगढ़ प्रखंड प्रखंड के ग्रामीण क्षेत्र भातुड़िया , शंकरपुर, चीहुटियां आदि जगहों पर धूमधाम से मनाया जा रहा है । लोकपर्व करमा पूजा हर साल भाद्रपद यानी भादो महीने के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी तिथि को मनाया जाता है।इस दिन विशेष रूप से बहने अपने भाईयों की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती है। और जावा डाली जिसमें कई प्रकार के बीज से उगे हरे भरे पौधा से सजी हुई डाली होती है उसके चारों तरफ बहने शुरू दिन से ही सामूहिक नृत्य करते हुए कर्मा का गीत गाती है और अंतिम दिन रात्रि फल फूल पकवान करम डाली की पूजा करती हैं। परम्परा के अनुसार पूर्व जमाने में भाई कर्मा पर्व पर बहनों से मिलने सौगात लेकर घोड़े पर बैठकर आते थे इसी परंपरा के अनुसार आज भी कर्मा पर्व पर भाई काल्पनिक घोड़े बनाकर करम डाली की परिक्रमा करते हैं और बहनों की श्रद्धा और प्रेम का सम्मान करते हैं।
आदिवासी मूल के लोग प्रकृति को ही अपना देवता मानते हैं. इसलिए करमा पूजा पर करम डाली को ईश्वर यानी प्रकृति का प्रतीक मानकर पूजा की जाती है।करम या करमा पर्व मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और उड़ीसा जैसे राज्यों में आदिवासियों द्वारा मनाया जाने वाला त्योहार है झारखंड में इसे आदिवासी समाज के अलावा भुइयां घटवाल, खेतोरी, यादव तेली, सुडी एवं अन्य समाज में बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। भुइयां घटवाल आदिवासी समाज में अखाड़ा बनाकर करम डाली की पूजा ,नृत्य प्रदर्शन की परंपरा है। इस दिन करमा-धरमा कथा का भी विशेष महत्व होता है. लोग करम पेड़ के डाल की पूजा करते हैं। रात के समय गीत गाकर सामूहिक नृत्य प्रदर्शन किया जाता है जिसमें भाई जन ग्रामीण ढोल मांदर आदि वाद्य यंत्र के साथ अखाड़ा नृत्य प्रस्तुत करते हैं। इस मौके पर विभिन्न तरह के पकवान बनाए जाते हैं और परिवार के सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। भातुड़िया बी के कथा वाचक हरिहर पंडित जी ने करमा धरमा का बारे में विस्तार पूरक सुनाएं।









