अजीत मिश्रा (खोजी)
सावधान प्रशासन! बर्बादी की कगार पर युवा पीढ़ी, जाग उठा है सिद्धार्थनगर।
- प्रशासन की ‘कुंभकर्णी नींद’ के खिलाफ सड़क पर उतरी जनता; तस्करों की गुंडागर्दी पर मचा बवाल।
- अब बर्दाश्त नहीं! सिद्धार्थनगर में मोहल्लेवासियों ने खोला नशे के अड्डों के खिलाफ मोर्चा।
- जनता को पता है ठिकाना, फिर पुलिस क्यों है अनभिज्ञ? नशे की गली में भारी हंगामा।
- ईमेल और पत्रों का असर शून्य, अब जनता खुद करेगी नशे के सौदागरों का हिसाब!
- चौकी प्रभारी का आश्वासन या खानापूर्ति? बढ़नी की जनता ने मांगी ‘कार्रवाई’, आश्वासन नहीं।
बस्ती मंडल ब्यूरो रिपोर्ट – 09 अप्रैल 2026
सिद्धार्थनगर: नशे के सौदागरों के खिलाफ फूटा जनता का आक्रोश, क्या गहरी नींद में सो रहा है प्रशासन?
सिद्धार्थनगर। उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के बढ़नी कस्बे में मंगलवार की रात जो मंजर देखने को मिला, वह जिला प्रशासन और पुलिस तंत्र की कार्यशैली पर एक बड़ा सवालिया निशान है। बस स्टॉप से लोहियानगर जाने वाली गली में उस समय हड़कंप मच गया जब सैकड़ों मोहल्लेवासियों ने एक कथित स्मैक विक्रेता परिवार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
यह केवल एक साधारण विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि उन जिम्मेदारों के खिलाफ एक खुला विद्रोह था जो नाक के नीचे फल-फूल रहे नशे के कारोबार को देखकर भी अपनी आँखें मूंदे बैठे हैं।
धमकी, गाली-गलौज और सरेआम गुंडागर्दी
घटना की शुरुआत तब हुई जब मोहल्ले के ही एक युवक और कथित तस्कर परिवार के बीच तीखी झड़प हुई। बात हाथापाई और सरेआम गाली-गलौज तक पहुँच गई। स्थानीय निवासी राजीव और अभिषेक शर्मा का कहना है कि वे इस जहर के खिलाफ बार-बार अधिकारियों को ईमेल और पत्र लिखकर गुहार लगा चुके हैं, लेकिन प्रशासन की चुप्पी ने तस्करों के हौसले इतने बुलंद कर दिए हैं कि अब वे आम जनता को डराने-धमकाने पर उतर आए हैं।
बर्बाद होती युवा पीढ़ी, खंडहरों में नशे का डेरा
स्थानीय व्यापारी सागर गुप्ता ने बेहद आक्रामक लहजे में कहा, “यह केवल नशा नहीं, हमारी अगली पीढ़ी का कत्ल है।” उन्होंने खुलासा किया कि गली के पास स्थित एक खंडहर नशेड़ियों का अड्डा बन चुका है, जहाँ बाहरी लोगों का जमावड़ा लगा रहता है। सवाल यह है कि जब आम जनता को पता है कि नशा कहाँ बिक रहा है और नशेड़ी कहाँ बैठ रहे हैं, तो पुलिस की ‘इंटेलिजेंस’ क्या केवल कागजों तक सीमित है?
पुलिस का आश्वासन: राहत या खानापूर्ति?
मौके पर पहुँचे चौकी प्रभारी वीरेंद्र यादव ने भारी भीड़ को कानूनी कार्रवाई का भरोसा देकर शांत तो करा दिया, लेकिन जनता के मन में यह सवाल अब भी सुलग रहा है कि क्या यह आश्वासन केवल उस वक्त के हंगामे को दबाने के लिए था?
जनता का विद्रोह: बढ़नी कस्बे में पहली बार इस तरह का सामूहिक विरोध देखा गया, जो यह दर्शाता है कि अब धैर्य का बांध टूट चुका है।
प्रशासनिक विफलता: नागरिकों द्वारा बार-बार ईमेल और लिखित शिकायतों के बावजूद कार्रवाई न होना पुलिस की कार्यप्रणाली पर गहरा संदेह पैदा करता है।
गुंडागर्दी का बोलबाला: तस्करों द्वारा आम नागरिकों को धमकाना यह सिद्ध करता है कि उन्हें कानून का खौफ नहीं रहा।
हॉटस्पॉट की पहचान: स्थानीय लोगों ने ‘खंडहर’ जैसे स्पष्ट ठिकानों की पहचान की है, फिर भी पुलिस की सुस्ती सवालिया निशान है।
“सफेद जहर के खिलाफ यह आक्रोश सिर्फ एक मोहल्ले की आवाज नहीं, बल्कि उन अनगिनत पिताओं और भाइयों की पुकार है जिनकी अगली पीढ़ी इस दलदल में फंस रही है।”
मोहल्लेवासियों का साफ कहना है कि अब उन्हें आश्वासन नहीं, ‘एक्शन’ चाहिए। अगर जल्द ही इन सफेद जहर के सौदागरों को जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा गया, तो जनता का यह गुस्सा किसी बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है।
सावधान प्रशासन! जनता जाग चुकी है। अब कार्रवाई कागजों पर नहीं, धरातल पर दिखनी चाहिए।














