
गुलशन साहू की रिपोर्ट –
दंतेवाड़ा – महामहिम राज्यपाल रमेन डेका आज दंतेवाड़ा जिले के प्रवास के दौरान बस्तर पंडुम कार्यक्रम में शामिल हुये। इस अवसर पर उन्होने ऐतिहासिक कार्यक्रम बस्तर पंडुम 2025 के आयोजन के लिये प्रशासन और विशेष रूप से मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह आयोजन पहली बार हो रहा है और इसका मुख्य उद्देश्य बस्तर की जनजातीय पारंपरिक कला , नृत्य , जनजातीय व्यंजन , स्थानीय खाद्य पदार्थ और संस्कृति को संरक्षित करना है। इस कार्यक्रम में बस्तर के सात जिलों सहित असम , ओडिशा , कर्नाटक , मध्यप्रदेश , तेलंगाना राज्यों के लगभग बारह सौ कलाकार भाग ले रहे हैं। महोत्सव ना केवल बस्तर की रीति लोक कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य किया है , बल्कि स्थानीय लोक कलाकार को अपनी प्रतिभा दिखाने का एक अद्वितीय मंच भी प्रदान किया है। कार्यक्रम को संबोधित करते हुये राज्यपाल ने कहा कि बस्तर का जनजातीय संस्कृति अपने अनोखी परंपरा , लोकगीत , नृत्य शैलियां और अपने हस्तशिल्प के लिये पूरे विश्व भर में जाना जाता है। यहाँ की प्रमुख जनजाति गोंड , मुरिया , मडिया हल्बा , धुरवा , दोरला आदि हैं। बस्तर के जनजातीय समुदाय के लोग पंडुम में मुख्य रूप से विभिन्न परम्पराओं , अनुष्ठानों का आयोजन करते हैं। ग्राम्य देवी -देवताओं की पूजा-अर्चना , लोक नृत्य , लोकगीत और संगीत , सामुदायिक भोज , शिकार , छोटे-छोटे मड़ई-मेला का आयोजन , प्रकृति , जंगल , नदियों का संरक्षण किया जाता है। बस्तर पंडुम हमारी संस्कृति का समीक्षा करने का मौका प्रदान कर रहा है। हम पूरी समर्पण के साथ अपनी विरासत की जड़ों से जुड़कर इसे एक नया आयाम देंगे। आधुनिक जीवन शैली को स्वीकार करते हुये भी अपनी विरासत को बचाए रखना ही सही मायने में समाज को एक सूत्र में बांधना है। इस तरह के आयोजन से निश्चित रूप से बस्तर के आदिवासी सांस्कृतिक विरासत को अखंड बनाये रखने में मदद मिलेगी। उन्होने कहा कि बस्तर पंडुम केवल एक महोत्सव नहीं है , बल्कि यह जनजातीय जीवन का पूरा स्केच है। यह आयोजन हमें बताता है कि किस प्रकार हमारी संस्कृति , नृत्य , संगीत , वेशभूषा , खानपान , आभूषण इत्यादि सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत बनाये रखते हैं। बस्तर के परंपरागत नृत्य जैसे गौर-माड़िया नृत्य आदि यहां की सांस्कृतिक विविधता को दिखाते हैं। बस्तर पंडुम के माध्यम से इस संस्कृति को एक मंच दिया जा रहा है। साथ ही इसके प्रदर्शन के माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार और समाज के सहयोग से बस्तर के सांस्कृतिक विरासत हो संरक्षित किया जा रहा है। गौरतलब है कि दंतेवाड़ा के हाई स्कूल मैदान में आयोजित चार दिवसीय संभाग स्तरीय कार्यक्रम में राज्यपाल डेका का पारंपरिक धुरवा तुआल एवं कलगी से स्वागत किया गया। कार्यक्रम में सातों जिलों के लगाये गये जनजातीय कला संस्कृति , वेशभूषा , खानपान की प्रदर्शनी का राज्यपाल ने अवलोकन किया। अवलोकन के दौरान उन्होंने जनजातीय पहनावा और आभूषणों के संबंध में युवाओं से चर्चा की। कार्यक्रम में बीजापुर जिला और असम राज्य के नर्तक दलों द्वारा आकर्षक प्रस्तुति दी गई। इस अवसर पर वनमंत्री केदार कश्यप , विधायक चैतराम अटामी सहित अन्य जनप्रतिनिधि सहित राज्यपाल के सचिव सी आर प्रसन्ना , कमिश्नर डोमन सिंह , आईजी सुंदरराज पी , संस्कृति विभाग के संचालक विवेक आचार्य , डीआईजी कमलोचन कश्यप , कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी , पुलिस अधीक्षक गौरव राय सहित अन्य अधिकारी उपस्थित थे।
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