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हरैया में प्रशासन की ‘बुलडोजर संस्कृति’: कानून की मर्यादा मलबे में तब्दील!

न नोटिस, न चेतावनी; सीधे चला पंजा: हरैया में सिस्टम ने उजाड़ी मासूमों की दुनिया।

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। हरैया में ‘सिस्टम’ का क्रूर बुलडोजर: न नोटिस, न सुनवाई, बस मलबे में तब्दील होते आशियाने।।

शुक्रवार 16 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती। लोकतंत्र में प्रशासन जनता का रक्षक होता है, लेकिन बस्ती जनपद की हरैया तहसील के भरुकहवा गाँव में जो हुआ, उसने इस परिभाषा को ही लहूलुहान कर दिया है। कड़ाके की इस जानलेवा ठंड में, जब संपन्न लोग हीटरों के सामने भी कांप रहे हैं, तब हरैया प्रशासन ने 14 परिवारों के सिर से छत छीनकर उन्हें खुले आसमान के नीचे मरने के लिए छोड़ दिया। यह कैसी न्याय व्यवस्था है जहाँ न नोटिस दिया गया, न पक्ष सुना गया, बस सीधे जेसीबी का पंजा चला दिया गया?

​पुश्तैनी यादों पर सरकारी वार

​पीड़ित धर्मेंद्र कुमार का दर्द पूरे गाँव की सिसकी बन चुका है। जिस घर में उनकी तीन पीढ़ियां (करीब 50 साल) पली-बढ़ीं, उसे पल भर में मिट्टी में मिला दिया गया। प्रशासन का यह तर्क कि ‘भवन सरकारी था इसलिए नोटिस की जरूरत नहीं’, कानून की धज्जियां उड़ाने जैसा है। क्या 50 साल से रह रहे नागरिकों को अपनी बात रखने का एक मौका भी नहीं मिलना चाहिए था?

​नियम ताक पर, मनमानी सर्वोपरि

​हैरानी की बात यह है कि क्षेत्रीय कानूनगो इसे ‘पंचायत भवन’ बताकर अपना पल्ला झाड़ रहे हैं, जबकि पीड़ित इसे अपना पुश्तैनी घर बता रहे हैं। कानून कहता है कि किसी भी बेदखली से पहले पूर्व सूचना और वैकल्पिक व्यवस्था अनिवार्य है, लेकिन यहाँ ‘बुलडोजर राज’ में कानून की किताबें शायद दफ्तरों की धूल फांक रही हैं। मासूम बच्चे और बेबस बुजुर्ग इस वक्त बर्फीली हवाओं के बीच मलबे के ढेर पर बैठे हैं। क्या इन बच्चों के आंसू शासन की कुर्सी तक नहीं पहुँच रहे?

​चुप्पी साधे जिम्मेदार

​जब इस त्रासदी पर एसडीएम हरैया से जवाब मांगा गया, तो उनका फोन न उठाना प्रशासन की संवेदनहीनता पर मुहर लगाता है। अगर कार्रवाई न्यायसंगत थी, तो अधिकारी जनता और मीडिया का सामना करने से कतरा क्यों रहे हैं?

मुख्य सवाल जो जवाब मांगते हैं:

  • ​क्या कड़ाके की ठंड में किसी परिवार को बेघर करना मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं है?
  • ​बिना लिखित नोटिस के किसी के आशियाने को गिराना किस नियमावली का हिस्सा है?
  • ​क्या प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ ‘ध्वस्त’ करना है, विस्थापितों के पुनर्वास की नहीं?

निष्कर्ष:

यह घटना केवल 14 घरों का गिरना नहीं है, बल्कि सिस्टम पर से आम आदमी के भरोसे का गिरना है। जिलाधिकारी महोदय को इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप कर निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई और पीड़ित परिवारों को मुआवजा देना केवल मांग नहीं, बल्कि न्याय की पुकार है। अन्यथा, इतिहास याद रखेगा कि जब मासूम ठंड में ठिठुर रहे थे, तब कलम के सिपाही चुप नहीं थे, लेकिन प्रशासन पत्थर दिल हो चुका था।

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