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बस्ती।। जिम्मेदारों की अनदेखी ने छीन ली पांच गोद की खुशियां, कब जागेगा स्वास्थ्य विभाग?

।। बस्ती स्वास्थ्य विभाग का शर्मनाक चेहरा: 9 प्रसव, 5 मौतें और अफसर अब भी कर रहे जांच-जांच का खेल।।

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। कागजों पर ‘सुरक्षित प्रसव’, हकीकत में पांच मासूमों की ‘बलि’।।

रविवार 18 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती से एक ऐसी खबर आई है जो हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था के खोखले दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है। मरवटिया उपकेंद्र के अधीन एक महिला ने नौ बार प्रसव झेला, जिसमें से पांच नवजातों की मौत हो गई। लेकिन अफसोस! स्वास्थ्य विभाग का ‘सुपरविजन’ और ‘निगरानी तंत्र’ कुंभकर्णी नींद सोता रहा।

⭐आंकड़ों की बाजीगरी या मासूमों की जान से खिलवाड़?

सरकार ‘संस्थागत प्रसव’ को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपये विज्ञापनों और योजनाओं (JSY, PMSMA) पर खर्च करती है। लेकिन बस्ती का यह मामला बताता है कि धरातल पर सब ‘हवा-हवाई’ है। जब सीडीओ सार्थक अग्रवाल ने समीक्षा की, तब जाकर यह कड़वा सच सामने आया कि सात प्रसव घर पर हुए और विभाग को पता तक नहीं चला।

क्या एएनएम, आशा और सुपरवाइजर सिर्फ अपनी डायरियां भरने में व्यस्त थे? नौ प्रसवों के दौरान किसी ने भी उस महिला की सुध क्यों नहीं ली? यह सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि उन पांच मासूमों की हत्या के समान है जिन्हें सही समय पर डॉक्टरी सहायता मिल सकती थी।

⭐नसबंदी फेल, सिस्टम भी फेल

हैरानी की बात तो यह है कि महिला की नसबंदी भी हुई थी, उसके बावजूद तीन बच्चे पैदा हुए। यह स्वास्थ्य विभाग की कार्यक्षमता पर एक बड़ा तमाचा है। नसबंदी फेल होना और फिर भी विभाग का बेखबर रहना यह दर्शाता है कि अधिकारियों को गरीब जनता के जीवन से कोई सरोकार नहीं है।

⭐जांच-जांच का खेल और ‘टालमटोल’ की नीति

सीडीओ ने जांच कर कार्रवाई की संस्तुति (सिफारिश) कर दी है, लेकिन मामला अब भी ‘सीएमओ स्तर’ की जांच में अटका हुआ है। सवाल यह उठता है कि:

जब प्रारंभिक जांच में लापरवाही स्पष्ट हो चुकी है, तो कार्रवाई में देरी क्यों?

क्या नई कमेटी बनाना सिर्फ मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश है?

क्या उन अधिकारियों और कर्मचारियों पर आपराधिक मामला दर्ज नहीं होना चाहिए जिन्होंने अपनी ड्यूटी में इतनी बड़ी कोताही बरती?

⭐ जवाबदेही तय होनी ही चाहिए

डॉ. राजीव निगम (सीएमओ) कह रहे हैं कि “जांच के बाद कार्रवाई होगी।” लेकिन जनता पूछ रही है कि तब तक और कितनी जानें जाएंगी? यह मामला केवल एक उपकेंद्र का नहीं है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है जो कागजों पर तो ‘ऑल इज वेल’ दिखाती है, लेकिन हकीकत में गरीबों की कब्रगाह बन चुकी है।

अगर अब भी दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मान लिया जाएगा कि प्रशासन को केवल ‘लक्ष्य’ पूरे करने से मतलब है, इंसानी जान की उसकी नजर में कोई कीमत नहीं है।

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