
अजीत मिश्रा (खोजी)
।। सिस्टम की ‘बीमार’ नीतियां: जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं।।
रविवार 18 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।
बस्ती।। सरकारी अस्पतालों की चौखट पर इलाज की आस में खड़ी गरीब जनता के साथ इससे क्रूर मजाक और क्या होगा कि जिन डॉक्टरों के कंधों पर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की जिम्मेदारी है, वे खुद ही उसे दीमक की तरह चाट रहे हैं। जिले में ‘लेवल-3’ जैसे उच्च पदों पर तैनात डॉक्टर सरकारी ड्यूटी को ताक पर रखकर आलीशान निजी क्लिनिक और नर्सिंग होम चला रहे हैं। हद तो तब हो गई जब रंगे हाथों पकड़े जाने के एक महीने बाद भी ‘साहबों’ पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। क्या स्वास्थ्य विभाग का संरक्षण ही इन डॉक्टरों की असली ताकत है?
💫रसूख के आगे नतमस्तक प्रशासन
खबर बताती है कि एक महीने पहले डिप्टी सीएमओ ने कुदरहा पीएचसी में तैनात एक बाल रोग विशेषज्ञ को निजी प्रैक्टिस करते पकड़ा था। नियमतः अब तक उन पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई हो जानी चाहिए थी, लेकिन नतीजा ‘ढाक के तीन पात’ ही रहा। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि ‘जुगाड़’ और ‘सेटिंग’ का खेल इतना गहरा है कि जांच रिपोर्ट फाइलों में ही दम तोड़ रही है। जब रक्षक ही रसूखदारों के आगे नतमस्तक हो जाएं, तो आम आदमी न्याय की उम्मीद किससे करे?
💫पीएचसी में ‘राजशाही’ और नियमों की धज्जियां
हैरानी की बात यह है कि लेवल-3 के डॉक्टर, जिनका पद जिले स्तर पर होना चाहिए, वे अपनी मर्जी से पीएचसी (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) स्तर पर जमे हुए हैं। आखिर क्यों? जवाब साफ है—ग्रामीण इलाकों में पकड़ बनाकर अपनी प्राइवेट दुकानदारी चमकाना। नियमानुसार जो डॉक्टर डिप्टी सीएमओ के रैंक का हो, वह पीएचसी पर तैनात नहीं रह सकता, लेकिन यहाँ नियम नहीं, ‘सुविधा’ का शासन चलता है।
💫सफेदपोशों की ‘फिक्सिंग’ का खेल
सूत्रों के हवाले से जो खबर आई है वह और भी डरावनी है। पकड़े जाने के वक्त सीएमओ ऑफिस में बैठे ‘शुभचिंतकों’ ने फोन पर ही मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की। यह सीधे तौर पर सरकारी तंत्र के भीतर पनप रहे भ्रष्टाचार का सबूत है। विभागीय कर्मचारी और बिचौलिए मिलकर सरकार की साख पर बट्टा लगा रहे हैं और शासन की मंशा को धूल धूसरित कर रहे हैं।
💫जनता कब तक झेलेगी यह मार?
एक तरफ सरकार बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का दावा करती है, दूसरी तरफ सरकारी डॉक्टर मोटी सैलरी और एनपीए (NPA) लेकर भी मरीजों को निजी अस्पतालों में लूटने के लिए मजबूर करते हैं। अगर एडी हेल्थ की नाराजगी के बाद भी कार्रवाई नहीं होती, तो यह मान लेना चाहिए कि जिले का स्वास्थ्य महकमा पूरी तरह वेंटिलेटर पर है।
💫सवाल तो बनता है:
👉क्या जांच के नाम पर केवल ‘खानापूर्ति’ की जा रही है?
👉पकड़े गए डॉक्टरों को अब तक सस्पेंड या स्थानांतरित क्यों नहीं किया गया?
👉क्या सीएमओ ऑफिस में बैठे बिचौलियों पर नकेल कसी जाएगी?
बस्ती की जनता अब केवल आश्वासन नहीं, ‘एक्शन’ चाहती है। अगर इन सफेदपोशों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो सरकारी अस्पतालों से जनता का भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा।















