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।। खाकी पर दाग: पैकोलिया पुलिस की नाक के नीचे दबंगों का तांडव, न्याय के लिए दर-दर भटक रही पीड़ित महिला।।

बस्ती पुलिस की संवेदना मरी: दो महीने से थाने के चक्कर काट रही दुष्कर्म पीड़िता, रक्षक बने दबंगों के मददगार?

अजीत मिश्रा (खोजी)

कानून की चौखट पर दम तोड़ती आबरू: बस्ती पुलिस की कार्यशैली पर कब लगेगा लगाम?

सोमवार 19 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। जहाँ एक ओर उत्तर प्रदेश सरकार ‘मिशन शक्ति’ और ‘एन्टी रोमियो स्क्वाड’ जैसे नारों से महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं बस्ती जिले के पैकोलिया थाने से आई खबर व्यवस्था की संवेदनहीनता की कलई खोल रही है। एक पीड़ित महिला, जो न्याय की आस में पिछले दो महीनों से खाकी के दर पर चक्कर काट रही है, उसे मिला तो सिर्फ आश्वासन का झुनझुना और दबंगों की धमकियां।

🔥हैवानियत की इंतहा और पुलिस की चुप्पी

अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, आरोपी अशोक यादव ने न केवल महिला के साथ नशीला पदार्थ सुंघाकर दुष्कर्म किया, बल्कि जब वह गर्भवती हुई और न्याय के लिए उसके घर पहुँची, तो उसे बर्बरता का सामना करना पड़ा। दबंगों (अशोक यादव और लवकुश यादव) ने न केवल उसके साथ मारपीट की, बल्कि उसके पेट पर वार कर अजन्मे बच्चे और महिला की जान लेने की कोशिश भी की। यह कृत्य मानवता को शर्मसार करने वाला है, लेकिन उससे भी ज्यादा शर्मनाक है स्थानीय पुलिस का रवैया।

🔥रक्षक ही भक्षक या दबंगों के मददगार?

पीड़ित महिला का आरोप है कि पैकोलिया थाना प्रभारी केवल बातों की जांच कर रहे हैं। दो महीने बीत जाने के बाद भी मुकदमा दर्ज न होना और उच्च अधिकारियों की आंखों में धूल झोंकना यह दर्शाता है कि कानून का इकबाल खत्म हो चुका है। जब एक पीड़ित महिला खून से लथपथ होकर थाने पहुँचती है और उसे वहां से भी न्याय के बजाय अपमान और धमकी मिलती है, तो सवाल उठना लाजमी है— क्या बस्ती पुलिस अब अपराधियों की ढाल बन चुकी है?

🔥 मुख्य सवाल जो जवाब मांगते हैं:—

👉 इतनी गंभीर धाराओं के बावजूद अब तक मुकदमा दर्ज क्यों नहीं हुआ?

👉 क्या स्थानीय पुलिस दबंगों के दबाव में काम कर रही है?

👉 घाघरा नदी में ‘बोटी-बोटी काटकर फेंकने’ जैसी धमकियां देने वाले आरोपी खुलेआम क्यों घूम रहे हैं?

बस्ती के पुलिस अधीक्षक को इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। अगर पैकोलिया पुलिस ऐसे ही संवेदनहीन बनी रही, तो जनता का कानून से विश्वास उठ जाएगा। एक अबला नारी का संघर्ष केवल उसका अपना नहीं है, यह समूचे प्रशासन की कार्यक्षमता की परीक्षा है। यदि जल्द ही कार्रवाई नहीं हुई, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि यहाँ ‘कलम’ और ‘कानून’ दोनों ही रसूखदारों की जेब में हैं।

नोट: इस लेख का उद्देश्य प्रशासन को उनकी जिम्मेदारी याद दिलाना और एक पीड़ित महिला को न्याय दिलाने की आवाज को बुलंद करना है।

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