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निर्मला अस्पताल में ‘सफेद कोट’ पर दाग: इलाज के दौरान बुजुर्ग महिला की मौत, परिजनों ने काटा हंगामा।

सुधार के बाद अचानक मौत कैसे? निर्मला अस्पताल की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल।

अजीत मिश्रा (खोजी)

निजी अस्पतालों की ‘मौत की दुकान’ में एक और बलि: लापरवाही या लूट का खेल?

बुधवार 28 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

संतकबीरनगर। खलीलाबाद के निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर हो रहा खिलवाड़ अब जानलेवा साबित होने लगा है। शहर के निर्मला अस्पताल में सोमवार को हुई एक 65 वर्षीय बुजुर्ग महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने न केवल एक परिवार को उजाड़ दिया, बल्कि निजी स्वास्थ्य केंद्रों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

​क्या हुआ था?

​बखिरा थाना क्षेत्र के बड़गो निवासी रामबाचन निषाद ने अपनी पत्नी बच्ची देवी (65) को पेट दर्द की शिकायत के बाद 24 जनवरी को निर्मला अस्पताल में भर्ती कराया था। परिजनों का कहना है कि इलाज के दौरान उनकी स्थिति में सुधार हो रहा था, लेकिन 26 जनवरी की सुबह अचानक हुई उनकी मौत ने सबको झकझोर दिया। आखिर जो मरीज ठीक हो रहा था, उसकी सांसें एकाएक कैसे थम गईं? यह महज इत्तेफाक है या सफेद कोट के पीछे छिपी कोई बड़ी लापरवाही?

​परिजनों का आक्रोश और पुलिसिया कार्रवाई

​घटना के बाद अस्पताल परिसर रणक्षेत्र में तब्दील हो गया। परिजनों ने डॉक्टरों और स्टाफ पर इलाज में भारी लापरवाही का आरोप लगाते हुए जमकर हंगामा किया। सूचना मिलने पर कोतवाली प्रभारी पंकज कुमार पांडेय दलबल के साथ मौके पर पहुंचे और स्थिति को संभाला। मृतक महिला के पति की तहरीर पर पुलिस ने अस्पताल के डॉक्टरों और अज्ञात स्टाफ के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर ली है।

​पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ‘सस्पेंस’ और विसरा सुरक्षित

​हैरानी की बात यह है कि प्राथमिक पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो सका है। पुलिस ने अब महिला का विसरा सुरक्षित (Preserve) कर जांच के लिए भेजा है। यह ‘साइलेंट डेथ’ कई सवाल खड़े करती है:

    • ​क्या अस्पताल में आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद थे?
    • ​क्या दवाइयों या इंजेक्शन में किसी प्रकार की चूक हुई?
    • ​विसरा रिपोर्ट आने तक क्या आरोपी खुलेआम घूमते रहेंगे?

सम्पादकीय टिप्पणी:

जिले में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए निजी अस्पताल केवल भारी-भरकम बिल वसूलने में माहिर हैं या मरीजों की जान बचाने में भी उनकी कोई रुचि है? निर्मला अस्पताल जैसी घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या आम आदमी का जीवन इतना सस्ता हो गया है कि वह किसी की लापरवाही की भेंट चढ़ जाए और सिस्टम केवल रिपोर्ट का इंतजार करता रहे?

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