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करोड़ों की योजना, धरातल पर सन्नाटा: बस्ती में जल जीवन मिशन फेल।

कागजों पर बह रहा 'विकास' का पानी, हकीकत में प्यासी है जनता।

व्यवस्था की ‘सूखी’ पाइपलाइन: कहाँ गया जनता की प्यास का समाधान?

विशेष रिपोर्ट: अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती। सरकार का नारा है— ‘हर घर जल, जल जीवन मिशन’। लेकिन बस्ती जिले के सदर ब्लॉक की जमीनी हकीकत इस नारे को चिढ़ा रही है। यहाँ पानी की टंकियां तो खड़ी हो गई हैं और घरों के बाहर नल (टोंटियां) भी टांग दी गई हैं, लेकिन इन नलों से पानी नहीं, सिर्फ ‘सफेद झूठ’ टपक रहा है।

कागजों पर पूर्ण, हकीकत में अपूर्ण

हैरानी की बात यह है कि जिन गांवों में अभी पाइपलाइन का जाल तक नहीं बिछा है, वहां विभागीय बोर्डों पर काम को ‘पूर्ण’ घोषित कर दिया गया है। सदर ब्लॉक के ढोरिका और सियारपार जैसे गांवों में लगे ये बोर्ड जल निगम के अधिकारियों की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा करते हैं। क्या प्रशासन की नजर में ढांचा खड़ा कर देना ही प्यास बुझाना है?

‘शोपीस’ बनी टंकियां और भ्रष्टाचार की गंध

करोड़ों की लागत से बनी ये टंकियां आज महज गांव की शोभा बढ़ा रही हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि:

🔥घटिया निर्माण: टेस्टिंग के दौरान ही पाइपों के जोड़ खुल रहे हैं।

🔥अधूरा काम: कहीं पाइप बिछाना भूल गए, तो कहीं सोलर कनेक्शन ही गायब है।

🔥सड़कों की बदहाली: पाइप डालने के नाम पर अच्छी-भली सड़कें खोद दी गईं, जिन्हें अब वैसे ही छोड़ दिया गया है।

🔥जनता का दर्द: “वोट के लिए नल, प्यास के लिए वही पुराना कल”

गांव की धनदेई और भरत लाल जैसे दर्जनों ग्रामीणों की आंखें अब थक चुकी हैं। किसी के घर नल लगा है पर पानी नहीं आता, तो कहीं पानी इतना गंदा है कि पीने लायक नहीं। लोग आज भी पुराने हैंडपंपों या दूषित स्रोतों पर निर्भर हैं। सवाल यह है कि जब 2019 में शुरू हुई योजना का लक्ष्य 2024 था और अब उसे बढ़ाकर 2028 कर दिया गया है, तो क्या तब तक जनता सिर्फ इन सूखी टोंटियों को देखकर अपनी प्यास बुझाएगी?

जवाबदेही किसकी?

जल निगम के अधिकारी लीपापोती वाले जवाब दे रहे हैं, लेकिन सवाल उन ठेकेदारों और इंजीनियरों पर है जिन्होंने बिना काम पूरा किए ‘कंपलीशन सर्टिफिकेट’ कैसे हासिल कर लिया? क्या यह जनता के टैक्स के पैसे की सीधी लूट नहीं है?

उच्चाधिकारियों को एसी कमरों से निकलकर इन गांवों की धूल फांकनी चाहिए, ताकि उन्हें पता चले कि टोंटियों से पानी नहीं, व्यवस्था की नाकामी बह रही है। यदि जल्द ही इस पर संज्ञान नहीं लिया गया, तो यह योजना ‘जल जीवन’ नहीं, बल्कि ‘जन शोषण’ का पर्याय बनकर रह जाएगी।

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