खाकी की खामोशी या अपराधियों से सांठगांठ? न्याय के लिए कोर्ट की चौखट ही आखिरी सहारा!
जज साहब कर रहे एसओ का काम: बस्ती मंडल में पुलिस प्रशासन की संवेदनशीलता हुई दफन।
अजीत मिश्रा (खोजी)
- वर्दी पर भारी अपराधी की ‘थैली’: जब तक कोर्ट का डंडा न चले, तब तक नहीं हिलती थानेदार की कलम।
- 156(3) का सहारा और पुलिस का नकारापन: क्या बिना अदालती आदेश के बस्ती में नहीं मिलता न्याय?
- न्यायपालिका पर बढ़ता मुकदमों का बोझ: पुलिस की लापरवाही की कीमत चुका रही है जनता।
- रक्षक ही जब भक्षक की ढाल बन जाएं, तो पीड़ित बेटियां कहां जाएं?
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
दिनांक: 08 अप्रैल 2026
विशेष लेख: “वर्दी की हठधर्मी या न्याय का गला घोंटने की साजिश?”
🎯 जब रक्षक ही बन जाएं न्याय की दीवार, तो पीड़ित आखिर किसके द्वार?🎯
बस्ती। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और न्यायपालिका के बीच खड़ी पुलिस अगर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ ले, तो समाज का पतन निश्चित है। बस्ती मंडल के थानों की जो तस्वीर आज उभरकर सामने आ रही है, वह न केवल शर्मनाक है बल्कि व्यवस्था पर एक गहरा तमाचा भी है। आखिर क्या वजह है कि एक रेप पीड़िता को एफआईआर दर्ज कराने के लिए थाने की चौखट छोड़कर कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है? क्या थानों के ‘साहब’ (एसओ) अब जज की भूमिका में आ गए हैं, या फिर अपराधियों के ‘खास’ बन गए हैं?
न्यायपालिका पर बढ़ता बोझ: पुलिस की नाकामी का सबूत
आंकड़े गवाह हैं कि थानों में दर्ज होने वाले आधे से अधिक गंभीर मुकदमे (बलात्कार, छेड़खानी, लूट) सीधे पुलिस द्वारा नहीं, बल्कि माननीय न्यायालय के 156(3) के आदेश पर दर्ज हो रहे हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि बस्ती मंडल की पुलिस अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर बैठी है। जब तक कोर्ट का डंडा नहीं चलता, तब तक दरोगा जी की कलम नहीं सरकती। सवाल यह है कि यदि हर मामले में जज साहब को ही पुलिस का काम करना है, तो थानों में भारी-भरकम वेतन लेकर बैठे इन एसओ और सिपाहियों की जरूरत ही क्या है?
“जिस दिन मुकदमा दर्ज न करने वाले एसओ के खिलाफ कोर्ट ने सख्त कार्रवाई शुरू कर दी, उस दिन थानों की कार्यशैली बदल जाएगी और अदालतों का बोझ आधा हो जाएगा।”
दौलत की धमक और वर्दी की मजबूरी
अखबार की पड़ताल और स्थानीय हालातों से यह साफ है कि अपराधी कोई साधारण व्यक्ति नहीं होता। रसूखदार अपराधी पुलिस को ‘अपना दोस्त’ बनाने के लिए दौलत का सहारा लेते हैं। यहीं पर पुलिस की संवेदनशीलता दम तोड़ देती है। पीड़िता की इज्जत की कीमत पुलिस की नजर में शून्य हो जाती है, जबकि अपराधी की थैली भारी पड़ती है। एक गरीब परिवार, जिसकी बहू-बेटी की अस्मत लूटी गई हो, वह पुलिस से धन नहीं बल्कि सहानुभूति और कार्रवाई की उम्मीद लेकर जाता है। लेकिन उसे मिलता है तो सिर्फ अपमान और टरकाऊ रवैया।
प्रमुख सवाल – जो प्रशासन को चुभेंगे:
🔔एसओ के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं? आखिर क्यों न्यायालय उन थानाध्यक्षों पर केस दर्ज नहीं करता जो जानबूझकर गंभीर अपराधों को दर्ज करने में आनाकानी करते हैं?
🔔पीड़िता का मानसिक शोषण कब तक? एक लड़की को अपनी आबरू की लड़ाई लड़ने के लिए थाने से कोर्ट तक का जो खर्चीला और पीड़ादायक सफर तय करना पड़ता है, उसका जिम्मेदार कौन है?
🔔क्या वर्दी सिर्फ वीआईपी के लिए है? क्या पुलिस का काम सिर्फ रसूखदारों को बचाना और गरीबों को न्याय के लिए दर-दर भटकाना रह गया है?
जनता की जय-जयकार या धिक्कार?
✍️6 अप्रैल को विभिन्न थानों में न्यायालय के आदेश पर दर्ज हुए आधा दर्जन मुकदमे (ग़ौर थाने में रेप केस और परशुरामपुर में छेड़खानी के मामले) इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि पुलिस सो रही है। बस्ती मंडल की जनता आज पूछ रही है कि क्या न्याय पाने के लिए ‘जज’ ही एकमात्र सहारा है?
जिस दिन पुलिस अपराधियों की दोस्त बनने के बजाय पीड़ितों की ढाल बन जाएगी, उस दिन जनता पुलिस की जय-जयकार करेगी। वरना, खाकी पर लगे ये दाग आने वाली पीढ़ियों के लिए अन्याय का प्रतीक बने रहेंगे।
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