बस्ती स्वास्थ्य विभाग में ‘लूट’ की सेल: 3 लाख दो, लाइसेंस लो! भ्रष्टाचार का ‘नंगा नाच’: डिप्टी सीएमओ की कलम और लाखों की खनक!
नियम ताक पर, नोटों की चमक: बस्ती में बिक रहे हैं मेडिकल लाइसेंस।साहब की तिजोरी भारी, जनता की सेहत पर बीमारी भारी!
अजीत मिश्रा (खोजी)
‘खुला’ रेट, तीन ‘लाख’ लाइए, ‘लाइसेंस’ ले ‘जाइए’— बस्ती स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार का ‘नंगा नाच’!
- डॉक्टर हैं या ‘डीलर’? 20 लाख महीना वसूली का सनसनीखेज आरोप।
- योगी राज में ‘भ्रष्टाचार का टापू’: बस्ती सीएमओ दफ्तर में ‘रेट लिस्ट’ फिक्स!
- डीएम की चौखट पर स्वास्थ्य विभाग के पाप: मजिस्ट्रेट जांच की उठी मांग।
- उमेश गोस्वामी का ‘हल्ला बोल’: क्या भ्रष्ट अफसरों पर चलेगा जांच का चाबुक?
- सफेदपोशों की साठगांठ बेनकाब: कौन-कौन हुआ ‘मैनेज’, कौन अब भी है अडिग?
बस्ती। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा करती है, लेकिन बस्ती जनपद का स्वास्थ्य विभाग इन दावों को ठेंगा दिखा रहा है। जिले में इन दिनों एक “ओपन रेट” की चर्चा सरेआम है— ढाई से तीन लाख रुपये दो और मनचाहा अल्ट्रासाउंड या पैथोलॉजी सेंटर का लाइसेंस ले लो। यह सनसनीखेज आरोप किसी और पर नहीं, बल्कि जिले के डिप्टी सीएमओ और अल्ट्रासाउंड/पैथोलॉजी लाइसेंस के नोडल अधिकारी डॉ. ए.के. चौधरी पर लग रहे हैं।
शिकायत से मचा हड़कंप: डीएम के पास पहुंची फाइल
भ्रष्टाचार के इस खेल का पर्दाफाश तब हुआ जब भारतीय किसान यूनियन (भानु गुट) के जिला उपाध्यक्ष उमेश गोस्वामी ने सीधे जिलाधिकारी (डीएम) की चौखट पर दस्तक दी। गोस्वामी ने लिखित शिकायत सौंपते हुए मजिस्ट्रेट जांच की मांग की है। आरोप है कि डॉ. चौधरी ने नियमों को ताक पर रखकर मोटी रकम के बदले ऐसे-ऐसे सेंटरों को हरी झंडी दी है, जो मानकों के करीब भी नहीं भटकते।
करोड़ों का काला खेल: प्रति माह 15-20 लाख की ‘ऊपरी’ कमाई?
शिकायतकर्ता का दावा है कि जिले में 100 से अधिक अवैध अल्ट्रासाउंड और पैथोलॉजी सेंटर धड़ल्ले से चल रहे हैं। इन सेंटरों से होने वाली अवैध वसूली का गणित चौंकाने वाला है:
- मासिक वसूली: प्रति माह लगभग 15 से 20 लाख रुपये।
- सालाना टर्नओवर: 2 करोड़ रुपये से अधिक की काली कमाई।
- संदेह के घेरे में: जिले में रेडियोलॉजिस्ट की कमी के बावजूद एक दर्जन से ज्यादा लाइसेंस कैसे जारी हो गए?
‘मैनेज’ होने वालों की लंबी कतार, पर उमेश गोस्वामी अडिग
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि स्वास्थ्य विभाग के इस दलदल में कई सफेदपोश और तथाकथित ‘नेता’ खुद को ‘मैनेज’ (बिक चुके) करा चुके हैं। भाजपा के एक स्थानीय नेता सुखराम गौड़ की शिकायत पर भी सवाल उठे हैं कि क्या वे भी इस भ्रष्टाचार की गंगा में हाथ धो रहे हैं? मीडिया और समाज की नजरों में अब उन लोगों की पहचान धूमिल हो रही है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने के बजाय समझौते कर रहे हैं।
सत्ता की हनक या सिस्टम की लाचारी?
हैरानी की बात यह है कि जिले की मुखिया (डीएम) की सख्ती के बावजूद सीएमओ कार्यालय के बाबू और अधिकारी बेखौफ हैं। एक तरफ अवैध सेंटरों पर कार्रवाई का नाटक होता है, तो दूसरी तरफ बैकडोर से लाइसेंस बांटने का धंधा चलता है। उमेश गोस्वामी की ईमानदारी और निडरता ने विभाग की नींद उड़ा दी है, लेकिन सवाल वही है— क्या जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति होगी या इस ‘सफेदपोश भ्रष्टाचार’ पर बुलडोजर चलेगा?
बड़ा सवाल: जब जिले में विशेषज्ञ डॉक्टरों का टोटा है, तो डॉ. ए.के. चौधरी की कलम से धड़ाधड़ निकल रहे लाइसेंसों का रहस्य क्या है? क्या जनता की जान से खिलवाड़ करने वाले इन “लाइसेंसधारी लुटेरों” पर लगाम लगेगी?
ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती मंडल
(भ्रष्टाचार के खिलाफ एक प्रहार)








