
सुरेन्द्र दुबे / बिकश पाठक
रीवा/मऊगंज। प्रदेश में ग्राम पंचायतों के विकास कार्यों के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। पंचायतों में सामग्री खरीदी के नाम पर ऐसा “करिश्माई खेल” चल रहा है, जिसमें नियम-कायदों को ताक पर रखकर अपात्र फर्मों से लाखों के बिल जारी किए जा रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर पंचायतों में विकास हो रहा है या सिर्फ कागजों में कमीशन का साम्राज्य खड़ा किया जा रहा है?
*मेडिकल स्टोर बना पंचायतों का सप्लायर!*
जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत खर्रा में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां “प्रेम मेडिकल स्टोर एण्ड इंटरप्राइजेज” नामक संस्था द्वारा गिट्टी, मुरूम, सीमेंट और अन्य निर्माण सामग्री के लाखों रुपये के बिल पंचायत सचिव एवं सरपंच के नाम पर जारी किए गए। हैरानी की बात यह है कि जिस संस्था का काम दवाइयां बेचना होना चाहिए, वह अब पंचायतों में निर्माण सामग्री सप्लाई करने लगी है!
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
क्या मेडिकल स्टोर को निर्माण सामग्री सप्लाई करने की पात्रता थी? क्या पंचायत ने विधिवत निविदा जारी की? क्या सामग्री वास्तव में पंचायत तक पहुंची ? या सिर्फ बिल बनाकर सरकारी राशि निकाल ली गई? विधायक प्रतिनिधि, सरपंच और सप्लायर सब एक ही खेल का हिस्सा?
सूत्र बताते हैं कि संबंधित मेडिकल स्टोर संचालक स्वयं विधायक प्रतिनिधि भी है और पंचायत व्यवस्था से गहरे संबंध रखता है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या राजनीतिक संरक्षण के दम पर पंचायतों को लूटने का खेल चल रहा है? यदि एक ही व्यक्ति सत्ता, पंचायत और सप्लाई सिस्टम से जुड़ा हो तो फिर निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
*पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले*
यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले मऊगंज जनपद में भी इसी तरह का बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ था, जहां एक लाईट की दुकान के नाम पर चाय-नाश्ता, टेंट, निर्माण सामग्री तक के बिल लगाए जा रहे थे। विरोध बढ़ा तो जांच हुई और तत्कालीन सीईओ को हटाना पड़ा। एक कर्मचारी भी दोषी पाया गया था। लेकिन सवाल वही है कि जब कार्रवाई आधी-अधूरी हो, तो भ्रष्टाचार रुकता कैसे?
*पंचायतों में ‘कमीशन मॉडल’ पर चल रहा विकास?*
ग्राम पंचायतों में सामग्री खरीदी के लिए स्पष्ट नियम हैं। पात्र वेंडर, निविदा प्रक्रिया, प्रतिस्पर्धात्मक चयन सब कागजों में मौजूद है। लेकिन हकीकत में: कोई टेंडर नहीं निकलता, कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती, सरपंच-सचिव मनमानी फर्म चुन लेते हैं, और फिर कमीशन के हिसाब से बिल पास होते हैं। सूत्रों की मानें तो कई पंचायतों में सरपंचों के रिश्तेदार ही सप्लायर बने बैठे हैं। महिला सरपंचों के नाम पर उनके पति या बेटे पूरा सिस्टम चला रहे हैं। एससी-एसटी महिला सरपंचों वाली पंचायतों में कई जगह सचिवों का सीधा नियंत्रण बताया जा रहा है।
*क्या सिर्फ कागजों में बन रहे विकास कार्य?*
ग्रामीणों का आरोप है कि कई पंचायतों में ज़मीन पर काम कम और कागजों में भुगतान ज्यादा दिखाई देता है। लाखों के बिल, फर्जी सप्लाई, अपात्र एजेंसियां और राजनीतिक संरक्षण यह पूरा नेटवर्क पंचायतों को विकास का केंद्र नहीं बल्कि भ्रष्टाचार का अड्डा बना रहा है। जांच हुई तो खुल सकते हैं बड़े नाम! यदि निष्पक्ष जांच हो जाए तो सिर्फ एक पंचायत नहीं, बल्कि कई जनपदों और ग्राम पंचायतों में इसी तरह के फर्जीवाड़े सामने आ सकते हैं। सवाल अब प्रशासन और जनपद अधिकारियों पर भी उठ रहे हैं कि आखिर बिना सत्यापन के भुगतान कैसे हो रहे हैं?
*जनता पूछ रही है सवाल*
क्या पंचायतों में विकास के नाम पर सरकारी धन की लूट हो रही है? क्या अपात्र फर्मों को संरक्षण दिया जा रहा है?
क्या जनपद अधिकारी सब जानते हुए आंखें मूंदे बैठे हैं?
और आखिर कब तक पंचायतों को “कमीशन केंद्र” बनाकर चलाया जाएगा? अब जरूरत है उच्चस्तरीय जांच की, ताकि पंचायतों में बैठे भ्रष्ट गठजोड़ का सच जनता के सामने आ सके।







