बिजली विभाग का ‘करंट’ गुल, बस्ती की जनता बेहाल; अधिकारियों की चुप्पी पर सवाल!
क्या बस्ती में बिजली का 'अघोषित आपातकाल' है? 72 घंटों से अंधकार में डूबा जनपद!
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती में ‘अंधेरा युग’: बिजली विभाग की लापरवाही से जनता बेहाल, कब जागेगा प्रशासन?
बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश:
- बस्ती बिजली संकट: कब जागेगा प्रशासन? जर्जर तारों और फुंकते ट्रांसफार्मरों से जनता परेशान!
- ‘बत्ती’ गुल, ज़िम्मेदार खामोश: बस्ती मंडल में बिजली व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त!
- मेंटेनेंस के नाम पर केवल खानापूर्ति, बस्ती के अंधेरे के लिए कौन ज़िम्मेदार?
- बिजली विभाग का फेल सिस्टम: अघोषित कटौती से ठप हुआ बस्ती का जनजीवन!
बस्ती: क्या बस्ती जिले में बिजली विभाग के अधिकारियों के लिए ‘लोकतंत्र’ के कोई मायने नहीं बचे हैं? जनता की गाढ़ी कमाई से टैक्स और बिजली बिल वसूलने वाला विभाग अब उनकी समस्याओं के प्रति पूरी तरह संवेदनहीन हो चुका है। रुधौली क्षेत्र में अघोषित बिजली कटौती ने जनता का जीना मुहाल कर दिया है, और इसके जिम्मेदार अधिकारी एसी कमरों में दुबके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच बस्ती जनपद इस समय ‘अंधेरा युग’ में जीने को मजबूर है। पिछले 72 घंटों से बस्ती की जनता अघोषित बिजली कटौती, बार-बार होने वाले फाल्ट और फुंकते ट्रांसफार्मरों के ‘ट्रिपल अटैक’ से त्रस्त है। भीषण गर्मी और उमस के बीच बिजली विभाग की लचर कार्यप्रणाली ने शहर से लेकर गांव तक के लोगों का जीना मुहाल कर दिया है।
“जनता तड़पे तो तड़पे, हमें क्या?”
भीषण गर्मी के बीच छोटे-छोटे बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं रात-रात भर बिजली के इंतजार में जागने को मजबूर हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि जब उपभोक्ता अपनी समस्या लेकर रुधौली विद्युत उपकेंद्र पर पहुंचे, तो वहां के अधिकारी नदारद मिले। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक अधिकारी खुद एसी कमरों से बाहर निकलकर जनता का दर्द नहीं देखेंगे, तब तक उन्हें जमीनी हकीकत का अंदाजा नहीं होगा।
संसाधनों का रोना या प्रशासनिक विफलता?
विभाग का दावा है कि उनके पास कर्मचारियों की भारी कमी है। शहरी क्षेत्र में मात्र 2 लाइनमैन और 4 श्रमिक, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में 3 लाइनमैन और 6 श्रमिक 7 फीडरों का बोझ ढो रहे हैं। सवाल यह है कि यदि विभाग को पहले से ही संसाधनों की इस कमी का पता था, तो जनता को अंधेरे में क्यों धकेला गया? फाइलों में व्यवस्था सुधारने की बात करने वाले जिम्मेदार अधिकारी, असलियत में मामले को दबाकर बैठने के सिवा कुछ नहीं कर रहे।
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा बिजली तंत्र
सवाल यह है कि आखिर बिजली विभाग का तंत्र इतना जर्जर कैसे हो गया कि मामूली हवा चलते ही फाल्ट हो जाते हैं और ओवरलोडिंग के नाम पर आए दिन ट्रांसफार्मर फुंक जाते हैं? क्या विभाग के पास मेंटेनेंस के नाम पर केवल कागजी खानापूर्ति करने का बजट है? स्थानीय लोगों का आरोप है कि जर्जर तारों को बदलने और ट्रांसफार्मरों की क्षमता बढ़ाने के बजाय विभाग केवल वसूली और लीपापोती में व्यस्त है।
आम जनता की सुनवाई क्यों नहीं?
पिछले तीन दिनों में बस्ती के कई इलाकों में घंटों बिजली गायब रही। जब जनता शिकायत के लिए कंट्रोल रूम या संबंधित अधिकारियों को फोन करती है, तो या तो फोन नहीं उठता और यदि उठता भी है, तो रटा-रटाया जवाब मिलता है—”जल्द आपूर्ति बहाल होगी।” यह ‘जल्द’ कब आएगा, इसका जवाब न तो एसडीओ के पास है और न ही अधिशासी अभियंता के पास।प्रदर्शनकारी जनता ने आरोप लगाया है कि जब उन्होंने अपनी समस्याओं के बारे में सवाल पूछे, तो अधिकारियों ने उन्हें जेल भेजने और ‘फिंकवा देने’ जैसी धमकियां दीं। जनता की सेवा के लिए तैनात अधिकारी अब ‘रक्षक’ के बजाय ‘तानाशाह’ बन गए हैं। एसडीडीओ और जेई का प्रदर्शन के दौरान घटनास्थल से भाग जाना उनकी कायरता और गैर-जिम्मेदाराना रवैये को दर्शाता है।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
क्या प्रशासन को इस बात का एहसास है कि बिजली न होने के कारण छात्र पढ़ाई नहीं कर पा रहे, अस्पताल में मरीजों की हालत खराब हो रही है और छोटे-मोटे व्यवसायी दाने-दाने को मोहताज हो गए हैं? बस्ती का RTO हो या अन्य सरकारी विभाग, भ्रष्टाचार के किस्से तो आम हैं ही, लेकिन अब बिजली विभाग ने भी उसी राह पकड़ ली है जहाँ जनता की समस्याओं का कोई मोल नहीं है।
हमारी चेतावनी
हम विभाग को चेतावनी देते हैं कि यदि अगले 24 घंटों के भीतर बस्ती की बिजली व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ, तो यह मुद्दा केवल मीडिया की सुर्खियों तक सीमित नहीं रहेगा। अब सड़क पर उतरकर जनता का आक्रोश फूटेगा, जिसके जिम्मेदार केवल और केवल लापरवाह अधिकारी होंगे।
बस्ती की जनता अब अंधेरे में रहने को तैयार नहीं है। बिजली विभाग अपनी कुंभकर्णी नींद त्यागे, वरना कुर्सी से उतरने की तैयारी रखे!













