
“कुदरत शांत मतलब सहमती नही.!”
विकास के नाम पर जीवनही नष्ट कंरनेका प्रयास कर तो नही रहे है हम ?
ईतीहास गंवा है,पुंजीवादी का प्रयास रहा है। हर बार कोई भी रास्ता अपना कर,अपना ऊल्लू सिधा करे।
जीन राज्योने,सरकारने उनका साथ दिया है। कुदरत ने उन सबको ‘ईतिहास’बना दिया है।
आज हम बिसवी सदी मे जी रहे है,क्या विषेश अंतर पडा है। कुछ भी नही,बस नाम,काम,दाम बदला है। पर कुदरत अपने आप छाती ताने खडी








