उत्तर प्रदेशलखनऊ

लखनऊ का ‘डिजिटल जाल’: समिट बिल्डिंग से संचालित हो रहा था अंतरराष्ट्रीय ठगी का अड्डा, 119 गिरफ्तार।

दिन में दफ्तर, रात में 'ठगी का गढ़': लखनऊ पुलिस ने विदेशी नागरिकों को लूटने वाले गिरोह का किया भंडाफोड़। ​सावधान! विदेशियों को ठगने वाले बड़े कॉल सेंटर का लखनऊ में खुलासा, 119 गिरफ्तारियां।

अजीत मिश्रा (खोजी)

लखनऊ की समिट बिल्डिंग में चल रहा था अंतरराष्ट्रीय ‘डिजिटल जाल’, विदेशी नागरिकों को ठगने वाले कॉल सेंटर का भंडाफोड़

  • सावधान! विदेशियों को ठगने वाले बड़े कॉल सेंटर का लखनऊ में खुलासा, 119 गिरफ्तारियां।
  • लखनऊ की ऊंची इमारतों में ‘डिजिटल अंधेरा’: विदेशी नागरिकों को अपना शिकार बनाने वाले शातिर गिरोह का पर्दाफाश।
  • रात के सन्नाटे में खुलता था ‘ठगी का दफ्तर’, लखनऊ पुलिस की छापेमारी में 100 से ज्यादा लैपटॉप बरामद।
  • अंग्रेजी के माहिर और विदेशी लहजे के शातिर: लखनऊ से चल रहा था अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी का रैकेट।

लखनऊ, 4 जुलाई 2026

​राजधानी लखनऊ के पॉश इलाके विभूतिखंड स्थित समिट बिल्डिंग की 11वीं मंजिल, जो बाहर से किसी अत्याधुनिक बहुराष्ट्रीय कंपनी का दफ्तर नजर आती थी, असल में अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी का एक बड़ा केंद्र निकली। लखनऊ क्राइम ब्रांच ने छापेमारी कर एक ऐसे संगठित गिरोह का पर्दाफाश किया है, जो रात के अंधेरे में सक्रिय होकर अमेरिका समेत कई देशों के नागरिकों को अपना निशाना बनाता था।

​शाम ढलते ही सक्रिय होता था ‘ठगी का नेटवर्क’

​पुलिस के अनुसार, यह ऑफिस दिन में शांत रहता था, लेकिन जैसे ही शाम के 7 बजते, ठगी का असली खेल शुरू हो जाता था। यह सिलसिला अगली सुबह 3 बजे तक चलता था। गिरोह ने बड़ी चालाकी से अपने ऑपरेशन को उन देशों के समय के अनुसार सेट किया था, जिन्हें वे निशाना बनाते थे। कर्मचारियों को 25 से 40 हजार रुपये मासिक वेतन के साथ ठगी की रकम का एक हिस्सा कमीशन के रूप में दिया जाता था, जिससे वे प्रति माह लाखों रुपये तक कमा रहे थे।

​तकनीकी मदद के नाम पर लूट

​ठगों का यह नेटवर्क बेहद शातिर था। वे इंटरनेट पर मौजूद फर्जी कस्टमर केयर नंबरों के जरिए लोगों को फंसाते थे। पीड़ितों द्वारा तकनीकी सहायता या रिफंड मांगने पर ये जालसाज उनके कंप्यूटर का रिमोट एक्सेस हासिल कर लेते थे। इसके बाद बैंकिंग जानकारी चुराकर खाते से पैसे उड़ा दिए जाते थे। इतना ही नहीं, पीड़ितों को ड्रग तस्करी या आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधों में फंसाने की धमकी देकर डराया-धमकाया भी जाता था।

​चार चरणों में बंटा था ‘क्राइम स्ट्रक्चर’

​पुलिस की जांच में खुलासा हुआ है कि पूरा रैकेट चार विशेषज्ञ टीमों में बंटा था:

  1. पहली टीम: फर्जी ईमेल और संदेश भेजकर जाल बिछाती थी।
  2. दूसरी टीम: तकनीकी सहायता के नाम पर भरोसा जीतती थी।
  3. तीसरी टीम: वित्तीय लेनदेन को अंजाम देती थी।
  4. चौथी टीम: खुद को अमेरिकी जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर पीड़ितों पर दबाव बनाती थी।

​देशभर से भर्ती किए गए थे युवा

​इस कॉल सेंटर में देश के विभिन्न राज्यों—खासकर पूर्वोत्तर भारत, असम, मेघालय, नगालैंड, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और उत्तराखंड से ऐसे युवाओं को भर्ती किया गया था, जिनकी अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ थी। पूर्वोत्तर राज्यों की युवतियों को उनके विदेशी लहजे के कारण प्राथमिकता दी गई थी। हालांकि, पुलिस का मानना है कि इनमें से कई कर्मचारी इस बात से अनजान थे कि वे किसी बड़े अपराध का हिस्सा हैं।

​करोड़ों का निवेश, पुलिस की बड़ी कार्रवाई

​ऑपरेशन मैनेजर ललित खैराजानी और विक्रम सिंह परमार की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने वहां से 100 से अधिक लैपटॉप, 177 से ज्यादा मोबाइल फोन, VoIP सिस्टम और अन्य डिजिटल उपकरण बरामद किए हैं। पुलिस के अनुसार, इस पूरे नेटवर्क पर सालाना लगभग तीन करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे थे, जो पिछले एक साल से बिना किसी रोक-टोक के चल रहा था।

​एडीसीपी (क्राइम) किरण यादव ने बताया कि विदेशी एजेंसियों से मिले इनपुट के आधार पर यह बड़ी कार्रवाई की गई है। फिलहाल, मास्टरमाइंड की तलाश जारी है और जब्त किए गए डिजिटल उपकरणों की फोरेंसिक जांच से और भी बड़े खुलासे होने की उम्मीद है।

[yop_poll id="10"]
Show More
Back to top button
error: Content is protected !!