सरकारी ‘यमराज’: कागजों में जिंदा युवती को बनाया ‘मृत’, अब न्याय के लिए भटक रही सुमन
बस्ती का शर्मनाक सच: कलम के एक झटके में युवती को किया 'मृत', सिस्टम की लापरवाही पर फूटा सुमन का गुस्सा; जिंदा होकर भी 'भूत' बनी सुमन: सरकारी फाइलों में दर्ज मौत, असल जिंदगी में संघर्ष का साया; 'मैं जिंदा हूँ साहेब!': सरकारी रिकॉर्ड की 'मौत' के खिलाफ जंग लड़ रही रतनपुर की बेटी।
अजीत मिश्रा (खोजी)
कागजों में ‘मौत’, हकीकत में ‘संघर्ष’: सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता का जीता-जागता उदाहरण सुमन
- ‘डिजिटल इंडिया’ या ‘मूर्खतापूर्ण इंडिया’? जिंदा युवती को मृत घोषित कर चैन की नींद सो रहा प्रशासन
- बाबूजी की कलम का कमाल: चलती-फिरती युवती को कागजों में मार डाला!
बस्ती। एक तरफ सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ का दम भरती है, तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले का एक मामला सरकारी तंत्र की सड़ चुकी व्यवस्था और अमानवीय लापरवाही का काला चिट्ठा खोल रहा है। रतनपुर अर्जुन गांव की 23 वर्षीय सुमन चौधरी आज अपने ही देश में ‘जीवित’ होने का सबूत देने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। सरकारी रिकॉर्ड में उसे ‘मृत’ घोषित कर दिया गया है। यह सिर्फ एक क्लर्क की गलती नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र पर तमाचा है जो बिना सोचे-समझे किसी की पहचान को मिटा सकता है।
क्या कागजों में कलम चलाने वाले अंधे थे?
सुमन चौधरी का जन्म 17 अगस्त 2002 को हुआ था। सवाल यह है कि 17 मई 2017 को जब तत्कालीन ग्राम पंचायत अधिकारी ने कलम उठाई थी, तो क्या उन्हें यह भी नहीं दिखा कि जिसे वे ‘मृत’ घोषित कर रहे हैं, वह जीवित है? वर्ष 2019 में जब सुमन ने हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की, तब यह तंत्र कहां सोया था?
एक युवा लड़की को ‘निरक्षर’ और ‘मृत’ घोषित कर देना महज एक टाइपिंग की गलती नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश या फिर चरम लापरवाही की पराकाष्ठा है।
छीन लिए गए मौलिक अधिकार
सरकारी रिकॉर्ड में हुई इस ‘मौत’ ने सुमन के भविष्य को दांव पर लगा दिया है।
- संपत्ति का अधिकार: पिता की संपत्ति में अपना हक पाने के लिए वह संघर्ष कर रही है।
- योजनाओं से वंचित: सरकारी योजनाओं का लाभ उसके लिए अब सपना बन चुका है क्योंकि कागजों में तो वह इस दुनिया में ही नहीं है।
- पहचान का संकट: आधार से लेकर अन्य दस्तावेजों तक, हर जगह यह ‘मृत’ का ठप्पा उसके सपनों के रास्ते का रोड़ा बन गया है।
आखिर कब तक जिम्मेदारों को मिलेगी छूट?
सुमन ने जिलाधिकारी से न्याय की गुहार लगाई है। उसने मांग की है कि रिकॉर्ड सुधारा जाए, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि उस ‘साहब’ का क्या, जिसने अपनी एक कलम से एक जीवित लड़की को ‘मरा हुआ’ बता दिया? क्या सिर्फ रिकॉर्ड ठीक कर देने से सुमन के बीते सालों का हर्जाना मिल जाएगा?
अक्सर ऐसे मामलों में जांच के नाम पर फाइलों को घुमा दिया जाता है और दोषी अधिकारी रिटायर होकर अपनी पेंशन का आनंद लेते हैं। अगर प्रशासन इस मामले में दोषी ग्राम पंचायत अधिकारी और संबंधित कर्मचारियों पर कड़ी अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई नहीं करता, तो यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि सरकारी सिस्टम आम आदमी की जिंदगी से खिलवाड़ करने की पूरी आजादी रखता है।
प्रशासन के लिए अग्निपरीक्षा
बस्ती प्रशासन के लिए यह मामला महज एक आवेदन नहीं है, बल्कि यह उनकी कार्यक्षमता और संवेदनशीलता की अग्निपरीक्षा है। सुमन का मामला साबित करता है कि सरकारी बाबूओं की मेज पर इंसानियत दम तोड़ देती है। अब देखना यह है कि जिलाधिकारी इस गंभीर मामले में क्या रुख अपनाते हैं—क्या सुमन को उसका ‘जीवन’ वापस मिलेगा, या वह फिर से फाइलों के जंगल में कहीं खो जाएगी?
जिम्मेदार कौन है? क्या इस लापरवाही के लिए सुमन को और कितना लंबा इंतजार करना पड़ेगा? जवाब प्रशासन को देना होगा।


















