
अजीत मिश्रा (खोजी)
पीढ़ी का रोष: यह सिर्फ परीक्षा का नहीं, भरोसे का संकट है
यह प्रतिरोध सिर्फ किसी एक शिक्षामंत्री या सरकार के प्रति उपजा असंतोष नहीं है। यदि आप गहराई से देखें, तो इसकी परतें हमारे पूरे सामाजिक ताने-बाने और व्यवस्था के उन तमाम स्तंभों तक जाती हैं, जिन पर हमारा भरोसा लंबे समय से टिका हुआ था।
बच्चों का यह विद्रोह केवल सत्ता के खिलाफ नहीं है; यह उन माता-पिता के प्रति भी है जो अंधी निष्ठा में डूबे हैं, उन रिश्तेदारों और शिक्षकों के प्रति है जिनके झूठ अब बेनकाब हो चुके हैं। यह उन दोस्तों से है जो राष्ट्रवाद और धर्म की आड़ में नफरत फैला रहे हैं, और उन तथाकथित नेताओं व गुंडों से है जो राजनीतिक आवरण ओढ़कर आस्था का व्यवसाय चला रहे हैं। उस मीडिया से भी है, जो जनहित की पहरेदारी छोड़कर वैचारिक अफीम बांटने में जुटा है।
व्यवस्था का चौतरफा अविश्वास
इस पूरे घटनाक्रम की चिंगारी भले ही एक अदूरदर्शी न्यायिक टिप्पणी से उठी हो, लेकिन इसके मूल में न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका तक फैल चुका गहरा अविश्वास है। सड़कों पर बरसती पुलिस की लाठियां और शासन का दमन चक्र केवल सरकार के अस्तित्व की लड़ाई नहीं है, बल्कि उन तमाम सहयात्रियों का संयुक्त प्रहार है—
- मीडिया के वे चेहरे, जो स्टूडियो में बैठकर असहमति को राष्ट्रद्रोह घोषित करते हैं।
- वे पड़ोसी, शिक्षक और जज, जिन्होंने सत्ता की इस बेलगाम तानाशाही को मौन स्वीकृति दी।
- वे मां-बाप, जिन्होंने अपने बच्चों के भविष्य को दांव पर लगाकर अहंकार को पालने दिया।
मासूमों की सिर्फ एक पुकार
हम इन्हें ‘Gen Z’ कहकर या पड़ोसी देशों के सत्ता-पलट के उदाहरणों से जोड़कर भयभीत होते हैं। लेकिन इन चेहरों को ध्यान से देखिए—ये कोई क्रांतिकारी या वैचारिक युद्ध लड़ने नहीं उतरे हैं। ये भगत सिंह नहीं हैं और न ही किसी ‘संपूर्ण क्रांति’ के आह्वान पर हैं।
उनकी मांगें बहुत सीधी और बुनियादी हैं:
वे सिर्फ एक निष्पक्ष परीक्षा चाहते हैं, न्यायसंगत सुनवाई चाहते हैं और अपनी मेहनत का हक़ चाहते हैं।
परंतु विडंबना यह है कि हम उन्हें वह न्यूनतम न्याय भी देने को तैयार नहीं हैं। हम मुंह खोलने वाले हर युवा को सबक सिखाना चाहते हैं, उसे कुचलना चाहते हैं। इस हठधर्मिता में हम अनजाने ही उस पीढ़ी को तोड़ देना चाहते हैं जो आने वाले दशक में इस देश की रीढ़ बनने वाली है। अपनी तात्कालिक राजनीतिक कुंठाओं के चलते हम अपने ही हाथों हिंदुस्तान का मुस्तकबिल मिटाने पर तुले हैं।
कैनवस बहुत बड़ा है
यह लड़ाई कांग्रेस बनाम भाजपा या किसी एक नेता के अस्तित्व की नहीं है। इसका कैनवास हमारी रोजमर्रा की क्षुद्र राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से कहीं अधिक बड़ा है।
वक्त की पुकार है कि इन्हें दुलारिए, इनके दर्द को समझिए। अपनी पुरानी और पूर्वाग्रही ट्रेनिंग के वशीभूत होकर इन युवाओं को “देशद्रोही”, “अराजक” या “विदेशी फंडेड टूलकिट” कहने की अपनी आदत से बाज आइए।
यदि आज हमने इनकी पीड़ा को अनसुना कर दिया, तो जब ये युवा घरों, कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों में लौटेंगे, तब हमारे पास उनसे नजर मिलाने की हिम्मत नहीं होगी। याद रखिए, आपके और इस युवा पीढ़ी के बीच की यह दरार अब पत्थर की लकीर बन चुकी है।









