
अजीत मिश्रा (खोजी)
पुरस्कार की चमक और जिम्मेदारी का अंधेरा: सर्वेष्ट मिश्रा प्रकरण पर एक तीखा सवाल
- प्रशिक्षण की महत्ता पर उठे गंभीर सवाल: बुनियादी शिक्षा को मजबूत करने वाले FLN (फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमेसी) प्रशिक्षण से शिक्षकों की गैर-हाजिरी ने विभागीय कार्यप्रणाली और व्यवस्था पर खड़े किए बड़े प्रश्नचिह्न।
- जिला प्रशासन की कार्रवाई: बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा अनुपस्थित पाए गए सभी शिक्षकों को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण तलब किया गया है।
- आम चर्चाओं का बाजार गर्म: पुरस्कार प्राप्त शिक्षकों के इस प्रकार के रवैये को लेकर स्थानीय स्तर पर और सोशल मीडिया पर तरह-तरह की चर्चाएं और विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार और नौनिहालों के भविष्य को गढ़ने के लिए सरकार लाख दावे करे, लेकिन जब बात खुद को ‘रोल मॉडल’ कहलाने वाले शिक्षकों की आती है, तो सिस्टम की पोल खुलते देर नहीं लगती। बस्ती सदर ब्लॉक से सामने आया यह मामला केवल एक शिक्षक की अनुपस्थिति का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है जो सम्मान मिलने के बाद खुद को नियमों से ऊपर समझने लगती है।
क्या यही है राष्ट्रपति और राज्य पुरस्कार की गरिमा?
वर्ष 2018 के राज्य पुरस्कार और राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक डॉ. सर्वेष्ट कुमार मिश्र का FLN (फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमेसी) जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण प्रशिक्षण से नदारद मिलना बेहद निराशाजनक है।
- जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना: FLN प्रशिक्षण का उद्देश्य प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों की बुनियादी शिक्षा को मजबूत करना है। जब इस तरह के अहम अभियानों में राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित शिक्षक ही गैर-हाजिर मिलेंगे, तो आम शिक्षकों से क्या उम्मीद की जाएगी?
- चहेतों की कार्यसंस्कृति: चर्चा है कि ऐसे शिक्षक अक्सर प्रशासनिक गलियारों में अपनी ‘पहुंच’ और रुतबे के बल पर बच निकलते हैं। क्या पुरस्कार मिलना शिक्षा के नियमों और प्रशिक्षणों से छूट मिलने का लाइसेंस बन जाता है?
विभाग की खानापूर्ति: नोटिस या लीपापोती?
बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा निरीक्षण के दौरान अनुपस्थित मिले शिक्षकों (जिनमें डॉ. सर्वेष्ट मिश्रा भी शामिल हैं) को नोटिस जारी करना महज एक औपचारिकता प्रतीत होता है।
सवाल यह है कि क्या यह नोटिस सिर्फ कागजी कार्रवाई बनकर रह जाएगा, या विभाग वास्तव में उन पर कोई सख्त कार्रवाई करने का माद्दा रखता है जो शिक्षा की गुणवत्ता को पलीता लगा रहे हैं?
निष्कर्ष
जब तक पुरस्कारों और सम्मानों का पैमाना केवल चापलूसी या कागजी उपलब्धियां रहेंगी और धरातल पर अनुशासनहीनता पर पर्दा डाला जाएगा, तब तक बस्ती या प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार के दावे कागजों तक ही सीमित रहेंगे। विभाग को चाहिए कि इस मामले में बिना किसी दबाव के कठोर कार्रवाई करे, ताकि यह संदेश साफ जा सके कि कानून और नियम हर किसी के लिए बराबर हैं—चाहे वह साधारण शिक्षक हो या राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित कोई खास शिक्षक।









