जावरा—आगामी दिनों में नगर के इकबाल गंज मैदान में मेला आयोजित किया जाना है। जिसके किराए को लेकर भाजपा पार्षदों द्वारा आपत्ति ली जाने की बात सामने आई है। ऐसा लगता है कि मनोरंजन के मकसद से लगने वाला मेला राजनीति की भेंट चढ़ने वाला है। सवाल यह उठता है कि क्या भाजपाई ही नहीं चाहते कि शहर में मेले का आयोजन हो | बच्चों व महिलाओं की मेला घूमने की इच्छा पूरी हो क्या भाजपा पार्षदों को इतनी भी समझ नहीं कि मेले में बच्चे, महिलाएं ही अधिक रुचि लेती है और ख़ास तौर पर इनके लिए मेला घूमने-फिरने व मनोरंजन से ज्यादा कुछ नहीं है। अपने नगर, गांव में मेला लगने पर कौन ऐसा होगा, जिसे खुशी नहीं होती होगी। क्या यह भी उल्लेख करना पड़ेगा कि मेले से क्षेत्र में रौनक बिखरी रहती है। दूसरे पहलू की बात करें तो जो लोग सालभर तक धंधे के चक्कर में मेला का इंतजार करते हैं वो 8 या 15 दिन के भीतर मेले में दुकान लगा कर कितना कमा लेते हैं? दावे के साथ कहा जा सकता है कि एक स्थान से दूसरे स्थान तक उनको माल लाने ले जाने का किराया-भाड़ा ही बहुत चुकाना पड़ता है। फिर इसकी क्या ग्यारंटी की मेला में उनकी कमाई इतनी होगी कि उनकी पूर्ति जो जाए। कभी-कभी अनावश्यक अड़ंगेबाजी को देख भाजपा पार्षदों की सोच पर भी तरस आता है। क्या कभी इन लोगों ने मेले में व्यापार-व्यवसाय करने वाले दुकानदारों के जीवन स्तर को नजदीक से देखने की कोशिश की है ? उनकी दिनचर्या को समझने का प्रयास किया है |
दुकानेंआवंटित करे नगर पालिका
ओर फिर इस क्षेत्र का तो नाम ही मेला मैदान है। जहां पिछले कई वर्षों से मेले का आयोजन होता आ रहा है। रहा सवाल जमीन के किराए का तो नगर पालिका को ऐसे आयोजन के लिए तो जगह निःशुल्क दे देना चाहिए या कम से कम किराया लेकर नपा खुद ही दुकानें आवंटित करे। जिससे कि बिचौलिए की भूमिका खत्म हो। मेला व्यापारियों से नगर पालिका पानी व साफ सफाई का न्यूनतम चार्ज वसूल कर उनको राहत प्रदान कर सकती है। कईं जगहों पर नगर पंचायत, नगर पालिका तथा नगर निगम ही हमारी सांस्कृतिक धरोहर रूपी मेले की दुकानें आवंटित करती है।