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।। दवा या जहर? सरकारी ‘डोज’ ने ली 9 बेजुबानों की जान, सिस्टम के हाथ खून से सने।।

।। डॉक्टर साहब 'एसी' में, फार्मासिस्ट के भरोसे मौत का खेल; रानीपुर गोशाला बनी बूचड़खाना।।

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। सिस्टम की ‘डोज’ या बेजुबानों के लिए ‘मौत का वारंट’? रानीपुर गोशाला कांड ने उठाए गंभीर सवाल।।

🔥ब्रेन हेमरेज से मरीं गायें: आखिर इन 9 मौतों का असली कसाई कौन?

🔥FIR तो झांकी है, असली गुनहगारों को बचाना क्या विभाग की बाकी है?

🔥बस्ती शर्मसार: क्या बेजुबानों की जान इतनी सस्ती है कि फोन पर ही लिख दी गई मौत?

रविवार 18 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। रानीपुर बेलाड़ी से आई खबर केवल 9 गायों की मौत का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह हमारे पशुपालन विभाग की जड़ों तक फैली लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना रवैये की सड़ांध है। एक गोशाला, जहाँ बेजुबानों को संरक्षण मिलना चाहिए था, वहां विभाग की ‘दवा’ उनके लिए ‘जहर’ बन गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में निकला ‘ब्रेन हेमरेज’ (दिमाग में ब्लीडिंग) यह चीख-चीख कर कह रहा है कि इन मौतों के पीछे कोई कुदरती बीमारी नहीं, बल्कि इंसानी लापरवाही का घातक कॉकटेल है।8edd9f34 2fa9 49b4 a0e8 ac10eb6ba3a2 1768739099915 8ca05637 f3db 4c8c 8177 c85d85b16914 1768739118994

💫फोन पर इलाज और फार्मासिस्ट के भरोसे ‘जीवन’

घटनाक्रम किसी को भी झकझोरने के लिए काफी है। जब एक गाय बीमार हुई, तो डॉक्टर साहब ने मौके पर जाकर अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय फोन पर ही ‘पर्चा’ लिख दिया और फार्मासिस्ट के हाथ दवा भेजकर अपना पल्ला झाड़ लिया। सवाल यह है कि क्या पशु चिकित्सक (Veterinary Doctor) केवल वेतन लेने के लिए हैं? अगर डॉक्टर खुद मौके पर नहीं जा सकता, तो फिर उन भारी-भरकम डिग्रियों और सरकारी सुविधाओं का क्या अर्थ है?

💫दवाओं पर रोक: गलती मान ली या सुबूत मिटा दिए?

मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी (CVO) ने आनन-फानन में अलबेडाजोल और अबामेसिटिन दवाओं पर पूरे जिले में रोक लगा दी है। यह कदम विभाग की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।

🔥क्या यह दवाएं एक्सपायर्ड थीं?

🔥क्या इनकी डोज में जानलेवा गड़बड़ी थी?

🔥या फिर ये दवाएं ही नकली थीं?

🔥अगर दवा सुरक्षित थी, तो रोक क्यों? और अगर असुरक्षित थी, तो अब तक इसका इस्तेमाल क्यों हो रहा था?

🔥कब थमेगा बेजुबानों पर ‘प्रयोग’ का सिलसिला?

पूर्व विधायक के आवास पर स्थित गोशाला में हुई इस घटना ने प्रशासनिक अमले में हड़कंप तो मचा दिया है, लेकिन क्या यह कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रहेगी? डॉक्टर अजय वरुण और फार्मासिस्ट प्रमोद पर FIR दर्ज होना तो केवल शुरुआत होनी चाहिए। असली न्याय तब होगा जब यह स्पष्ट होगा कि आखिर एक ‘डीवॉर्मिंग’ (कीड़े मारने की दवा) की सामान्य प्रक्रिया सामूहिक हत्याकांड में कैसे बदल गई।

“बेजुबान बोल नहीं सकते, इसका मतलब यह नहीं कि उनकी जान की कोई कीमत नहीं है। सरकारी फाइलों में दर्ज ये 9 मौतें, हमारी व्यवस्था के गाल पर एक जोरदार तमाचा हैं।”

पुलिस जांच कर रही है, रिपोर्ट का इंतजार है, लेकिन रानीपुर की खाली पड़ी खूंटियां और तड़पती गायें चिल्ला-चिल्ला कर पूछ रही हैं कि आखिर इस ‘सिस्टम’ का इलाज कौन करेगा?

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