“वृक्षारोपण का ‘पुण्यकाल’ या आरा मशीनों का ‘जंगल-काल’? रुधौली से एक सवाल”

अजीत मिश्रा (खोजी)
‘माँ के नाम एक पेड़’ का शोर और आरा मशीनों में दफन जंगल: रुधौली से एक आईना
- “आम और महुआ की बलि, आरा मशीन की दहलीज़ पर ‘लोकतंत्र’ की आरी!”
- “पर्यावरण बचाने का ढोंग? रुधौली में पत्रकारों के ‘सवालों’ पर क्यों चल रही है कुल्हाड़ी?”
- “क्या अब पेड़ों से पहले प्रश्नों की होगी छंटाई? पर्यावरण संरक्षण पर उठते गंभीर सवाल”
बस्ती/रुधौली: इन दिनों चारों ओर ‘पुण्यकाल’ का उल्लास है। हर हाथ में पौधा है, हर कैमरे के सामने मुस्कान है और हर भाषण में पर्यावरण बचाने की चिंता। ऐसा लगता है मानो धरती अब चैन की साँस ले लेगी। सोशल मीडिया पर पौधारोपण की फोटो का ‘रोपण’ पूरे शवाब पर है। लेकिन इस दिखावटी हरियाली के पीछे बस्ती जनपद के रुधौली क्षेत्र में एक ऐसा सच भी है, जो किसी भी पर्यावरण प्रेमी को विचलित कर देने के लिए पर्याप्त है।
जंगल का कत्ल, कागजों में ‘वैधता’
पौधारोपण के आयोजनों से महज कुछ किलोमीटर दूर, आरा मशीनों पर एक अलग ही ‘पर्यावरण सम्मेलन’ चल रहा है। यहाँ मशीन की गूँज किसी भाषण से कम प्रभावशाली नहीं होती। आम और महुआ के सदियों पुराने वृक्ष यहाँ लट्ठे बनकर अपनी अंतिम यात्रा पर हैं। जब स्थानीय लोग सवाल उठाते हैं, तो आरा मशीन संचालक अपनी फाइलें खोल देते हैं—”सब कुछ वैध है।” कागज़ इतने सलीके से तैयार किए गए हैं कि लगता है जैसे जंगल स्वयं अनुमति लेकर कटने आया हो। जनता असमंजस में है कि अपनी आँखों पर विश्वास करे या कागजों पर?
जाँच का पेच: ‘अर्जुन’ के नाम पर ‘महुआ’ की बलि
स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, वन विभाग से अनुमति अक्सर अर्जुन या यूकेलिप्टस जैसे पेड़ों के नाम पर ली जाती है, जबकि कुल्हाड़ी आम और महुआ पर चलती है। यहाँ तक कि कटान के बाद वृक्षों के ठूँठ और जड़ों को भी उखाड़ने की कवायद की जाती है, ताकि कल कोई सबूत न बचे। सवाल उठता है कि यदि सब कुछ पारदर्शी है, तो वृक्ष कटान का विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? यदि कागज़ और वास्तविकता में अंतर है, तो प्रशासन ने अब तक मूकदर्शक बने रहना क्यों उचित समझा है?
पत्रकार पर मुकदमा: क्या प्रश्नों पर भी लगेगी ‘आरी’?
इस पूरे प्रकरण का सबसे स्याह पहलू वह है, जहाँ वृक्षों की चिंता पीछे छूट गई और सवाल उठाने वाला पत्रकार चर्चा का केंद्र बन गया। रुधौली में वृक्ष कटान पर आवाज उठाने वाले पत्रकार पर मुकदमा दर्ज होना यह संकेत देता है कि अब पर्यावरण से पहले ‘प्रश्नों की छँटाई’ शुरू हो गई है। जब प्रश्न पूछने वाला ही अपराधी लगने लगे, तो समझना चाहिए कि जंगल केवल पेड़ों के नहीं, विचारों के भी विरल हो रहे हैं।
संकल्प का आह्वान
लोकतंत्र प्रश्नों से नहीं डरता, वह सुधार का मार्ग प्रशस्त करता है। प्रकृति को एक परिपक्व वृक्ष बनाने में आधी सदी लगती है, जबकि उसे ‘लट्ठा’ बनने में कुछ मिनट ही लगते हैं। ‘माँ के नाम एक पेड़’ का नारा तभी सार्थक होगा, जब हम उस संकल्प के साथ एक और वचन जोड़ें—“माँ जैसी शीतल छाया देने वाले उन पुराने वृक्षों को भी बचाएँ, जो आज भी जीवित हैं।”
पौधा लगाना आसान है, फोटो खिंचवाना उससे भी आसान है, लेकिन एक वृक्ष को कटने से बचाना सबसे कठिन—और सबसे आवश्यक—कार्य है।
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