उत्तर प्रदेशबस्ती

बस्ती का ‘विकास’ नदी के हवाले: पगारे घाट पर 10 हजार जिंदगियां मौत के साये में

पुल के नाम पर सिर्फ 'जुमले', नाव के सहारे जिंदगी काट रहे नरकटहा के ग्रामीण; प्रशासन की नींद कब खुलेगी? पगारे घाट पर हर साल 'मौत' के मुंह में जा रहे स्कूली बच्चे: बस्ती के पगारे घाट पर सरकारी तंत्र फेल: जनता कर रही 'श्रमदान', सरकार दे रही केवल 'आश्वासन'

अजीत मिश्रा (खोजी)

जमीनी हकीकत: बस्ती में ‘विकास’ का दम, पगारे घाट पर नाव के सहारे 10 हजार जिंदगियां

  • विकास की ‘नाव’ बीच मजधार: पुल के इंतजार में बूढ़ी हो गई पीढ़ी, फिर भी घाट वही!
  • इंजीनियरों की फाइलों में दर्ज है पुल, पर हकीकत में सिर्फ ‘लकड़ी का जुगाड़’
  • वादे हजार, लेकिन रास्ते वही पुरानी ‘नाव’: जनप्रतिनिधियों के दावों की खुली पोल

बस्ती: क्या 21वीं सदी के भारत में बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसना विकास की परिभाषा है? बस्ती जिले के रामनगर विकास खंड की नरकटहा ग्राम पंचायत स्थित पगारे घाट की तस्वीर इसी सवाल को भयावह रूप में पेश करती है। कुआनो नदी पर एक अदद पुल न होने के कारण 10 हजार ग्रामीण हर साल बरसात के मौसम में ‘मौत के सफर’ को मजबूर हैं।

​आश्वासनों के पुल पर तैरती लाचारी

​स्थानीय निवासियों का दर्द यह है कि वे वर्षों से पुल की मांग कर रहे हैं, लेकिन प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की फाइलों में यह पुल आज भी महज एक ‘काल्पनिक ढांचा’ बनकर रह गया है। चुनावी मौसम में विकास के बड़े-बड़े वादे करने वाले नेता और जनप्रतिनिधि, बारिश शुरू होते ही लापता हो जाते हैं। ग्रामीणों का यह कहना गलत नहीं होगा कि उन्हें केवल वोट बैंक समझा गया है, नागरिक नहीं।

​’श्रमदान’ का पुल और प्रशासनिक विफलता

​हैरत की बात यह है कि जब सरकारें हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती हैं, तब ग्रामीण खुद अपने श्रमदान से लकड़ी का अस्थायी पुल बनाते हैं। जो काम राज्य के बजट और इंजीनियरों की देखरेख में होना चाहिए था, वह गांव वालों की मजबूरी बनी हुई है। बारिश का पहला झोंका आते ही कुआनो का उफान इस पुल को तिनके की तरह बहा ले जाता है और फिर शुरू होती है नाव वाली ‘जुगाड़ संस्कृति’, जो न केवल समय की बर्बादी है, बल्कि सीधे-सीधे मौत को आमंत्रण भी है।

​स्कूली बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़

​सबसे अधिक चिंताजनक पहलू बच्चों का भविष्य है। गौर और बभनान के स्कूलों में पढ़ने वाले नन्हे-मुन्नों को रोज उफनती नदी में नाव पर सवार होकर जाना पड़ता है। क्या जिले के जिम्मेदार अधिकारियों को इन बच्चों की जान की कोई कीमत नहीं दिखती? 6 किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए 22 किलोमीटर का चक्कर काटना पड़ता है, जो क्षेत्र की आर्थिक और शैक्षिक कमर तोड़ रहा है।

​सत्ता का आईना: विधायक कह रहे, बजट नहीं है!

​सपा विधायक अतुल चौधरी और राजेंद्र चौधरी द्वारा पुल निर्माण के लिए प्रयास करने और विधानसभा में मुद्दा उठाने की बात कहना एक औपचारिकता मात्र लगती है। प्रश्न यह है कि यदि चार वर्षों से मांग की जा रही है और बजट स्वीकृत नहीं हो रहा है, तो फिर जनता को यह कैसे भरोसा दिलाया जाए कि आप जनप्रतिनिधि के रूप में उनका हित साधने में सक्षम हैं? अगर सरकारी खजाने में जनता की सुरक्षा और सुविधा के लिए पैसा नहीं है, तो फिर यह विकास कैसा?

​वक्त आ गया है जागने का

​पगारे घाट का यह मामला शासन-प्रशासन के मुंह पर एक तमाचा है। यह केवल एक पुल की मांग नहीं है, बल्कि उस उपेक्षा का जवाब है जो वर्षों से इन 10 हजार ग्रामीणों को दी जा रही है।

​क्या सरकार तब जागेगी जब कोई बड़ी अनहोनी होगी? बस्ती के प्रशासनिक तंत्र को अब आश्वासन की रस्म अदायगी छोड़कर युद्धस्तर पर पुल निर्माण की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह ‘विकास’ केवल चुनावी भाषणों तक ही सीमित रहेगा और पगारे घाट की नियति नाव में ही दम तोड़ेगी।

[लेखक का सुझाव: यह रिपोर्ट जिला प्रशासन और संबंधित विभाग के लिए एक चेतावनी है। स्थानीय निवासियों को अब इन आश्वासनों के बवंडर से बाहर निकलकर एकजुट होकर अपनी मांग को और अधिक मुखर करना होगा।]

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