उत्तर प्रदेशबस्ती

अधिकारी नदारद, बिचौलिये मालामाल: खाद घोटाले के आगे घुटने टेकता सिस्टम

ईमानदारी का चोला, भ्रष्टाचार का लबादा: क्या बस्ती में बिक चुका है किसानों का हक? 'साहब' का आवास और 50 हजार का सोफा: खाद की कालाबाजारी की चौंकाने वाली कहानी

​अजीत मिश्रा (खोजी)

’50 हजार’ के सोफे में बिका ‘साहब’ का ईमान: बस्ती में खाद की कालाबाजारी पर जिम्मेदार मौन

  • ’50 हजार’ के सोफे पर बिका जिम्मेदार अधिकारियों का ईमान, बस्ती में किसानों का शोषण जारी
  • बस्ती का काला सच: खाद की कालाबाजारी और अधिकारियों की ‘सोफा-भेंट’ का खेल

बस्ती: जिले में खाद की किल्लत और कालाबाजारी ने किसानों की कमर तोड़ दी है, लेकिन प्रशासन के गलियारों में स्थिति कुछ और ही बयां कर रही है। बस्ती में उर्वरक की कालाबाजारी करने वाले आधा दर्जन से अधिक होलसेलर्स के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय, जिम्मेदार अधिकारी कथित तौर पर ‘सोफे’ के लालच में उनके सामने बिकते हुए नजर आ रहे हैं।

सोफे का खेल और कालाबाजारी का गणित

​मामला तब सामने आया जब कालाबाजारी से बचने के लिए एक होलसेलर द्वारा जिला कृषि अधिकारी के आवास पर 50 हजार रुपये का सोफा भिजवाने की चर्चा तेज हो गई। सवाल यह उठता है कि जिस सिस्टम में खाद 400 रुपये की बोरी होलसेलर द्वारा रिटेलर को दी जा रही हो, वह किसानों को 266 रुपये में कैसे उपलब्ध हो सकती है?

​इस गणित में केवल किसानों का शोषण हो रहा है। एक रिटेलर ने आरोप लगाया कि उसने 200 बोरी के लिए 79 हजार रुपये दिए, लेकिन उसे खाद नसीब नहीं हुई। बिचौलिये इस खाद को 500 रुपये से अधिक में बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं, जबकि इसमें मंत्री से लेकर जिला कृषि अधिकारी तक की मिलीभगत की बू आ रही है।

कार्यालयों में ताले, अधिकारी वसूली में व्यस्त

​जब रिपोर्टर ने जिला कृषि अधिकारी कार्यालय की पड़ताल की, तो वहां का नजारा बेहद चौंकाने वाला था। कार्यालय में एक भी बाबू या अधिकारी मौजूद नहीं था; सभी कुर्सियां खाली पड़ी थीं। बताया जा रहा है कि संबंधित अधिकारी क्षेत्र में ‘वसूली’ के काम में व्यस्त थे। यह उस जिले के विभाग का हाल है, जिसके प्रभारी स्वयं कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही हैं।

  • भ्रष्टाचार की भेंट: बस्ती में उर्वरक (खाद) की कालाबाजारी चरम पर है, जहाँ आरोप है कि अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय महज 50 हजार के सोफे के बदले कालाबाजारियों के आगे नतमस्तक हो गए हैं।
  • मुनाफे का खेल: जब होलसेलर्स द्वारा रिटेलर्स को 400 रुपये में खाद दी जा रही है, तो उसका 266 रुपये में बिकना असंभव है। इस गणित के पीछे का सच यह है कि बिचौलियों और अधिकारियों की मिलीभगत से किसानों को लूटा जा रहा है।
  • अधिकारियों की उदासीनता: आलम यह है कि सरकारी कार्यालयों में जिम्मेदार कुर्सियाँ खाली रहती हैं और अधिकारी ‘वसूली’ के काम में व्यस्त रहते हैं। जिले की जनता जिन्हें ईमानदार मानती है, वे पर्दे के पीछे भ्रष्टाचार की मलाई काट रहे हैं।
  • राजनीतिक विफलता: किसानों की समस्याओं के प्रति संवेदनहीनता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जनप्रतिनिधियों के दबाव और शोर-शराबे के बावजूद, सिस्टम में बैठे ‘साहब’ का ईमान एक सोफे के आगे बिक जाता है।

नेताओं की नौटंकी और किसानों का दुर्भाग्य

​जिले में खाद की कालाबाजारी पर बैठकों में नेता शोर तो मचाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन अधिकारियों ने ईमानदारी का चोला पहनकर भ्रष्टाचार का लबादा ओढ़ लिया है। विधायक द्वारा माफी मांगने की घटना ने भी जनता को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या जनता के प्रतिनिधि और प्रशासन मिलकर किसानों के अधिकारों का सौदा कर रहे हैं?

​जब तक जिला कृषि अधिकारी और विकास कार्य से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों पर ठोस कार्रवाई नहीं होगी, तब तक बस्ती का किसान खाद के लिए यूं ही दर-दर भटकता रहेगा।

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