उत्तर प्रदेशबस्तीराम मंदिर अयोध्यासिद्धार्थनगर 

बस्ती: नवयुवकों के हाथों में खनकते अवैध असलहे: आखिर कौन दे रहा है युवा पीढ़ी को मौत का सामान?

यह उन तमाम परिवारों, शिक्षण संस्थानों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो युवाओं को सही और गलत का फर्क समझाने में नाकाम साबित हो रहे हैं।

बुलंदियों पर रसूख का नशा और तमंचों की खनक: आखिर कहां से आ रहे नवयुवकों के हाथों में अवैध असलहे?

  • रौनाही टोल फायरिंग: ‘रसूख’ के नशे में चूर युवकों ने कानून और इंसानियत दोनों को रौंदा
  • बेलगाम ‘थार संस्कृति’ और तमंचों का शौक: किस अंधकार की तरफ बढ़ रहा है आज का युवा समाज?
  • हाईवे पर बढ़ती गुंडागर्दी और अवैध हथियारों का खुला खेल: कब जागेगा खुफिया और प्रशासनिक तंत्र?
  • खिलौनों की जगह हाथों में पिस्टल: पारिवारिक परवरिश और सामाजिक मूल्यों की भारी चूक का नतीजा

​अयोध्या के रौनाही टोल प्लाजा पर हाल ही में घटी खौफनाक घटना ने एक बार फिर समाज और व्यवस्था के माथे पर गहरी चिंता की लकीरें खींच दी हैं। लखनऊ से बस्ती की तरफ जा रही बिना नंबर की एक काली ‘थार’ गाड़ी में सवार युवकों की अंधेरगर्दी ने न सिर्फ कानून के इकबाल को खुली चुनौती दी, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि आज की युवा पीढ़ी के हाथों में कानून का डर नहीं, बल्कि मौत का सामान यानी अवैध असलहे कितनी आसानी से पहुंच रहे हैं।

​इस पूरी घटना की पटकथा किसी फिल्मी सीन जैसी डरावनी है। 25-26 अगस्त की दरमियानी रात रौनाही टोल प्लाजा पर बैरियर तोड़ने के बाद जब टोलकर्मियों ने टैक्स मांगा, तो मामूली बात पर भड़के इन युवकों ने गोली चलाने से भी गुरेज नहीं किया। इस कायराना फायरिंग में टोलकर्मी सुफियान गंभीर रूप से घायल हो गया, जो आज अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा है। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आदर्श सिंह और दीपेश तिवारी को गिरफ्तार कर लिया है तथा थार गाड़ी भी बरामद कर ली है, जबकि अन्य तीन आरोपी अभी भी फरार हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि इस वारदात से जुड़े आरोपी बस्ती और सिद्धार्थनगर जैसे जनपदों से ताल्लुक रखते हैं, जो यह बताता है कि अपराध का यह नेटवर्क अब ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में कितनी तेजी से पैर पसार रहा है।

​लेकिन इस पूरी घटना से उपजा सबसे बड़ा और भयावह सवाल यह है—आखिर इन नवयुवकों और कम उम्र के लड़कों के पास अवैध असलहे आ कहां से रहे हैं?

​क्या तमंचे और पिस्टल अब बच्चों के खिलौने या आम वस्तुओं की तरह आसानी से उपलब्ध होने लगे हैं? कुछ साल पहले तक अवैध हथियारों की खरीद-फरोख्त के लिए एक छुपा हुआ आपराधिक दायरा होता था, लेकिन आज स्थिति यह हो चुकी है कि सोशल मीडिया पर हथियारों के साथ नुमाइश करने का चलन, इंस्टाग्राम की आभासी दुनिया में ‘दबंग’ दिखने की होड़ और स्थानीय स्तर पर अपराधियों से बढ़ती नजदीकियों ने युवाओं के जेहन से कानून का खौफ पूरी तरह मिटा दिया है। बिना नंबर की गाड़ियां, महंगी एसयूवी और उनके डैशबोर्ड या सीटों के नीचे छिपे अवैध असलहे आज के दौर में युवाओं के बीच ‘रॉब’ और ‘रसूख’ का प्रतीक बन गए हैं।

​यह केवल रौनाही की एक अकेली दुर्घटना नहीं है, बल्कि यह उन तमाम परिवारों, शिक्षण संस्थानों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो युवाओं को सही और गलत का फर्क समझाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। जब घर के युवा या नाबालिग बच्चे बिना नंबर की गाड़ियों से बेखौफ सड़कों पर फर्राटा भरते हैं और अभिभावकों को उनकी गतिविधियों की सुध तक नहीं होती, तो यह मान लेना चाहिए कि सामाजिक और पारिवारिक परवरिश में कोई बहुत गंभीर चूक हो रही है। इसके साथ ही, स्थानीय पुलिस और खुफिया तंत्र की नाकामी भी कम बड़ी नहीं है। अवैध हथियारों के तस्कर आखिर किन सुरक्षित पनाहगाहों में फल-फूल रहे हैं, जिन तक खाकी की पहुंच समय पर नहीं हो पाती?

​यदि इस ‘थार संस्कृति’ और अवैध असलहों के बेलगाम होते कारोबार पर समय रहते सख्त पाबंदी नहीं लगाई गई, तो आने वाले दिनों में राजमार्गों और टोल प्लाजाओं पर आम नागरिकों की सुरक्षा भगवान भरोसे हो जाएगी। यह वक्त सिर्फ दो-चार आरोपियों को गिरफ्तार कर अपनी पीठ थपथपाने का नहीं, बल्कि उस गहरे सामाजिक कैंसर का इलाज करने का है जो हमारी युवा पीढ़ी के भविष्य को दीमक की तरह चाट रहा है। समाज, परिवार और पुलिस प्रशासन—तीनों को मिलकर इस दिशा में कड़े कदम उठाने होंगे, अन्यथा यह हिंसा हमारे आने वाले कल को पूरी तरह लील जाएगी।

[yop_poll id="10"]
Show More
Back to top button
error: Content is protected !!