बस्ती: महर्षि वशिष्ठ मेडिकल कॉलेज में संवेदनहीनता, 18 घंटे तक स्ट्रेचर पर तड़पती रही लावारिस महिला
यह घटना एक आईना है कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था में कागजी दावों के पीछे कितनी बड़ी मानवीय त्रासदी छिपी है। यदि प्रशासन ने इस मामले में कठोर कार्रवाई नहीं की, तो ऐसे अस्पतालों का 'मेडिकल कॉलेज' कहलाना समाज के लिए केवल एक दिखावा मात्र रह जाएगा।
अजीत मिश्रा (खोजी)
संवेदनहीनता की पराकाष्ठा: क्या अस्पताल अब ‘इलाज’ की जगह ‘लावारिस’ छोड़ने की जगह बन गए हैं?
- इलाज के बजाय टालमटोल: फ्रैक्चर और मानसिक बीमारी से जूझ रही महिला को धूप और बारिश में छोड़ना पड़ा
- मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने मामले को माना गंभीर, लापरवाही बरतने वाले स्टाफ से मांगा जवाब
- पुलिस के हस्तक्षेप के बाद महिला को बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर रेफर किया गया
बस्ती: क्या हमारे स्वास्थ्य तंत्र की आत्मा मर चुकी है? यह सवाल बस्ती के महर्षि वशिष्ठ मेडिकल कॉलेज की उस भयावह तस्वीर को देखकर मन में उठना स्वाभाविक है, जहाँ एक मानसिक रूप से बीमार और फ्रैक्चर से जूझती लावारिस महिला 18 घंटे तक इलाज के लिए तड़पती रही।
यह कोई सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के पतन की पराकाष्ठा है। जिस अस्पताल का कर्तव्य जीवन बचाना है, वहाँ की गलियारे में एक असहाय महिला का घंटों तक स्ट्रेचर पर पड़े रहना और उस पर मक्खियाँ भिनभिनाना, उस पूरे सिस्टम के चेहरे पर एक काला धब्बा है।
सवाल यह है कि:
- जिम्मेदारी किसकी? जब वह महिला जिला अस्पताल से मेडिकल कॉलेज रेफर होकर पहुँची, तो मेडिकल कॉलेज के चिकित्सकों और स्टाफ ने उसे 18 घंटे तक वार्ड में शिफ्ट क्यों नहीं किया?
- संवेदनहीनता या लापरवाही? प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि चिकित्सकों और स्टाफ ने उस महिला के पास जाना तक मुनासिब नहीं समझा। क्या एक ‘लावारिस’ होने का मतलब यह है कि उसका इलाज करने की जहमत भी नहीं उठाई जाएगी?
- टालमटोल की राजनीति: अस्पताल प्रशासन का यह तर्क कि उसे ‘कार्डियक अरेस्ट’ की समस्या बताकर रेफर किया गया था, जबकि कोई जांच नहीं हुई, सीधे तौर पर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का एक शर्मनाक प्रयास है।
हद तो तब हो गई जब उस बीमार महिला को इलाज देने के बजाय, एम्बुलेंस कर्मियों पर दबाव बनाकर उसे कहीं और भेजने की कोशिश की गई। इस खींचतान में उस महिला को पहले चिलचिलाती धूप में और फिर बारिश में भीगने के लिए मजबूर होना पड़ा।
मेडिकल कॉलेज के उप-प्राचार्य ने मामले को ‘गंभीर’ बताया है और जवाब-तलब करने की बात कही है। लेकिन क्या केवल नोटिस जारी करने से उस महिला का दर्द कम हो जाएगा? क्या भविष्य में किसी और लावारिस मरीज को ऐसी ही नर्क जैसी स्थितियों से नहीं गुजरना पड़ेगा?
यह घटना एक आईना है कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था में कागजी दावों के पीछे कितनी बड़ी मानवीय त्रासदी छिपी है। यदि प्रशासन ने इस मामले में कठोर कार्रवाई नहीं की, तो ऐसे अस्पतालों का ‘मेडिकल कॉलेज’ कहलाना समाज के लिए केवल एक दिखावा मात्र रह जाएगा।
















