बस्ती का ‘जल जीवन मिशन’: टंकी फटी तो ऑपरेटर पर मुकदमा, निर्माण की गुणवत्ता पर सन्नाटा!
राजपुर बैरिहवा में करोड़ों की टंकी ध्वस्त: क्या एक पंप ऑपरेटर ने धारदार औजार से फोड़ दी सरकारी संपत्ति? 'हर घर नल' की खुली पोल: टंकी फटी तो ठेकेदारों पर कार्रवाई के बजाय ऑपरेटर को बनाया बलि का बकरा!
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती में ‘जल जीवन मिशन’ बना ‘जल जीवन तमाशा’: निर्माण की पोल खुली तो विभाग ने ऑपरेटर को बनाया बलि का बकरा!
- बस्ती: जल निगम की कार्यशैली पर सवाल—टंकी में दरारें, और एफआईआर दर्ज!
- क्या करोड़ों की टंकी इतनी कमजोर थी? विभाग ने जांच के बजाय दर्ज कराया मुकदमा!
बस्ती: केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘जल जीवन मिशन’ के तहत बस्ती जिले में बिछाई गई पाइपलाइन और पानी की टंकियों की हकीकत अब सतह पर आ गई है। कुदरहा ब्लॉक के राजपुर बैरवा गांव में करोड़ों रुपये की लागत से बनी पानी की टंकी के फटने की घटना ने विभाग के दावों की कलई खोल दी है। लेकिन, भ्रष्टाचार की परतें उधेड़ने के बजाय, सिस्टम ने अपनी खाल बचाने के लिए सारा ठीकरा एक पंप ऑपरेटर और उसके परिवार पर फोड़ दिया है।

गुणवत्ता पर उठे गंभीर सवाल
सवाल यह है कि जो पानी की टंकी गांवों में ‘हर घर नल’ का सपना साकार करने के लिए बनाई गई थी, वह कुछ ही समय में कैसे ‘ध्वस्त’ हो गई? यदि निर्माण कार्य मानक के अनुरूप हुआ था, तो टंकी में दरारें क्यों आईं? या फिर यह किसी धारदार हथियार से की गई तोड़फोड़ है, जैसा कि विभाग ने आरोप लगाया है? अगर यह वास्तव में किसी ने नुकसान पहुँचाया है, तो क्या इतनी बड़ी सरकारी संपत्ति की सुरक्षा के लिए वहां कोई सीसीटीवी कैमरा या सुरक्षा तंत्र तैनात नहीं था?
बलि का बकरा बना ऑपरेटर, बड़े अधिकारी खामोश
हैरानी तब हुई जब विभाग ने अपनी जवाबदेही तय करने के बजाय कलवारी थाने में प्रमोद शुक्ला और उनके बेटे निहाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा दिया। क्या करोड़ों की इस परियोजना की नाकामी का एकमात्र जिम्मेदार एक पंप ऑपरेटर है? एफआईआर में दावा किया गया है कि धारदार औजार से टंकी फाड़ी गई है। अब जनता यह पूछ रही है कि क्या टंकी कागज की बनी थी जो एक औजार से फट गई, या फिर उसमें इस्तेमाल हुई सामग्री इतनी घटिया थी कि वह मामूली दबाव या चोट भी बर्दाश्त नहीं कर सकी?
भ्रष्टाचार की आंच से क्यों बच रहे ठेकेदार?
इस पूरे प्रकरण में ठेकेदारों की भूमिका पर पर्दा डालना विभाग की नीयत पर सवालिया निशान लगाता है। अक्सर देखा गया है कि सरकारी परियोजनाओं में गुणवत्ता के साथ समझौता कर कमीशनखोरी का खेल खेला जाता है। राजपुर बैरवा की घटना इसी भ्रष्टाचार का एक जीता-जागता नमूना हो सकती है।
जनता की मांग: निष्पक्ष जांच हो
क्या विभाग का यह मुकदमा केवल असली दोषियों को बचाने का एक हथकंडा है? अब जरूरत है कि इस मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए। यदि निर्माण में लापरवाही पाई जाती है, तो संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों पर ‘सरकारी संपत्ति को नुकसान’ पहुँचाने का नहीं, बल्कि ‘जनता के धन की लूट’ का मुकदमा चलना चाहिए।
बस्ती की जनता पूछ रही है—क्या यही है ‘जल जीवन मिशन’ का असली चेहरा? क्या विकास के नाम पर केवल खानापूर्ति हो रही है? प्रशासन को जवाब देना होगा कि इस टंकी के निर्माण में गुणवत्ता की जांच किसने की थी और किसकी शह पर घटिया सामग्री का उपयोग हुआ?
अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि ‘जल जीवन मिशन’ बस्ती में केवल ‘धन लूटो मिशन’ बनकर रह गया है।










