
बस्ती पीडब्ल्यूडी में भ्रष्टाचार और शिकायतों का ‘अजीब खेल’
बस्ती पीडब्ल्यूडी: 'संजय पगार' के खेल में क्यों उलझा 'प्रेमचंद्र' का मामला? अपात्र को 'पात्र' बनाने का खेल: विभाग की कार्यप्रणाली पर खड़े हुए गंभीर सवाल
अजीत मिश्रा (खोजी)
लोक निर्माण विभाग (PWD) में शिकायतों का खेल: ‘संजय पगार’ की शिकायत और उठते सवाल
- शिकायत ‘प्रेमचंद्र’ की क्यों? एसई (SE) के खिलाफ बोलने से क्यों बच रहे ठेकेदार?
- पीडब्ल्यूडी में भ्रष्टाचार की परतें: टेंडर बाबू, विभागीय सांठगांठ और जांच की मांग
- क्या ‘मैनेज’ हो गया मामला? संजय पगार की शिकायत और मचे घमासान की पूरी हकीकत
बस्ती: जिले के लोक निर्माण विभाग (PWD) में इन दिनों एक अजीबोगरीब स्थिति बनी हुई है, जहाँ ठेकेदार संजय सिंह पगार द्वारा की गई एक शिकायत ने विभाग के कामकाज और कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं।बस्ती लोक निर्माण विभाग (PWD) में ठेकेदार संजय सिंह पगार द्वारा की गई एक शिकायत ने विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार और आंतरिक राजनीति की पोल खोल दी है। यह मामला न केवल विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि ठेकेदारों और अधिकारियों के बीच के कथित गठजोड़ को भी उजागर करता है।
क्या है पूरा मामला?
ठेकेदार संजय सिंह पगार ने ‘प्रहरी एप’ पर एक शिकायत दर्ज कराई थी, जिसके बाद हुई जांच में पाया गया कि उनके अपने कागजात अधूरे थे और उन्हें अपात्र घोषित कर दिया गया। इस घटना के बाद स्थानीय ठेकेदारों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि शिकायतकर्ता में साहस था, तो उन्होंने विभाग के ‘एसई’ (अधीक्षण अभियंता) के खिलाफ शिकायत क्यों नहीं की?संजय पगार द्वारा की गई शिकायत के बाद ठेकेदारों का एक वर्ग अब उन्हीं पर सवाल उठा रहा है। ठेकेदारों के प्रमुख तर्क इस प्रकार हैं:
- यदि संजय पगार को शिकायत ही करनी थी, तो उन्होंने टेंडर बाबू प्रेमचंद्र को ही निशाना क्यों बनाया, जबकि एसई (अधीक्षण अभियंता) को शिकायत के दायरे से बाहर क्यों रखा गया?
- ठेकेदारों के अनुसार, यदि शिकायतकर्ता में साहस था, तो उन्हें एसई के खिलाफ भी शिकायत करनी चाहिए थी।
- आशंका जताई जा रही है कि एसई के खिलाफ शिकायत न करने का कारण यह डर था कि कहीं पीडब्ल्यूडी से उनका ‘बोरिया-बिस्तर’ न बंध जाए और काम ठप न हो जाए।
ठेकेदारों के आरोप और सवाल
इस मामले में विभाग के ठेकेदारों ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं:
- निशाने पर कौन? ठेकेदारों का आरोप है कि संजय पगार ने एसई को छोड़कर केवल टेंडर बाबू प्रेमचंद्र को ही निशाना क्यों बनाया?
- मिलीभगत की आशंका: ठेकेदारों का यह भी मानना है कि यदि एसई और ठेकेदार दोनों गलत हैं, तो फिर शिकायत का आधार क्या है? ऐसी आशंका जताई जा रही है कि डर के कारण एसई को शिकायत से बाहर रखा गया ताकि विभाग में काम बंद न हो जाए।
- दोषी कौन? ठेकेदारों का कहना है कि यदि ‘प्रहरी एप’ के अधिकारियों की जांच हो, तो पता चलेगा कि अपात्र को पात्र बनाने का खेल लखनऊ से लेकर बस्ती तक कैसे खेला गया।
दावा किया गया है कि प्रेमचंद्र का इतिहास भी विवादों से भरा रहा है।
- अतीत में, प्रेमचंद्र और तत्कालीन एक्सईएन हरेंद्रनाथ पांडे के बीच विवाद हुआ था, जिसके बाद प्रेमचंद्र को लखनऊ अटैच कर दिया गया था।
- वर्तमान में, जब ‘प्रहरी एप’ पर संजय पगार के दस्तावेजों की जांच हुई, तो वे अपात्र पाए गए, जिससे संकेत मिलता है कि पहले उन्हें अनुचित तरीके से पात्र बनाया गया था।
- ठेकेदारों का मानना है कि ‘प्रहरी एप’ से जुड़े उन अधिकारियों की भी जांच होनी चाहिए जिन्होंने अपात्र को पात्र बनाया।
भ्रष्टाचार की जड़ें और जांच की मांग
ठेकेदारों का एक बड़ा वर्ग इस पूरे तंत्र की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है। उनकी मुख्य चिंताएं निम्न हैं:
- संपत्ति की जांच: ठेकेदारों का कहना है कि टेंडर बाबू से लेकर चपरासी तक की ‘आय से अधिक संपत्ति’ की जांच होनी चाहिए।
- दबाव की राजनीति: नेताओं द्वारा की जाने वाली शिकायतों पर भरोसा कम हो गया है क्योंकि अक्सर लाभ मिलने के बाद नेता अपने पत्र का दुरुपयोग होने का बहाना बनाकर पीछे हट जाते हैं।
- व्यवस्था में सुधार: ठेकेदारों का आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया में कमियों को लखनऊ में ‘प्रहरी एप’ के माध्यम से सुधारा जाता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर टेंडर बाबू और अधिकारियों की मिलीभगत से असली खेल चलता है।
जाँच की मांग और विभागीय कार्यप्रणाली
अनेक ठेकेदारों ने मांग की है कि विभाग में ‘आय से अधिक संपत्ति’ की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उनका कहना है कि यदि स्थानीय स्तर पर चपरासी से लेकर टेंडर बाबू तक की संपत्ति की जांच हो, तो बड़े खुलासे हो सकते हैं। साथ ही, यह भी आरोप है कि अक्सर नेता शिकायत तो करते हैं, लेकिन बाद में स्वार्थ सिद्ध होने पर अपने पत्र के दुरुपयोग का हवाला देकर पीछे हट जाते हैं।
निष्कर्ष
इस पूरे प्रकरण ने विभाग के अधिकारियों और बाबू के बीच की साठगांठ को उजागर कर दिया है। विभाग में मची इस खलबली के बीच अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या उच्च स्तर से कोई ठोस कार्रवाई होती है या मामला हमेशा की तरह ‘मैनेज’ कर लिया जाएगा।यह पूरा प्रकरण यह स्पष्ट करता है कि विभाग में सब कुछ ठीक नहीं है। एक तरफ संजय पगार की पहल को सराहनीय माना जा रहा है, तो दूसरी तरफ इसे ‘मैनेज’ करने की कोशिशों की भी चर्चा है। लेख के अनुसार, कैबिनेट मंत्री द्वारा स्थानांतरण पत्र लिखे जाने के बावजूद प्रेमचंद्र का तबादला न होना, उस विभाग में फैले भ्रष्टाचार और रसूख की गहराई को दर्शाता है।
















