उत्तर प्रदेशबस्तीलखनऊ

अस्पताल से घर आए पिता, घर के बाहर पहरा: मानवीय संवेदनाओं के कत्ल की एक कहानी!

क्षेत्र के मुद्दों पर 'लॉकडाउन' और नेताओं पर 'हाउस अरेस्ट': आखिर किसे बचाया जा रहा है? जहाँ 'सवाल' गुनाह हो जाए, वहाँ 'अरेस्ट' ही एकमात्र समाधान!

अजीत मिश्रा (खोजी)

लोकतंत्र या पुलिसिया पहरा? सवाल पूछना अब ‘गुनाह’ की श्रेणी में!

  • लोकतंत्र का दम घोंटती पुलिसिया ‘जेल’: सवाल पूछने पर क्यों खौफ में है प्रशासन?
  • बीमार पिता और ‘हाउस अरेस्ट’ बेटा: क्या सत्ता अब संवेदनहीनता की हदें पार कर चुकी है?
  • आवाज़ दबाने का ‘खाकी’ कवच: प्रवीण पाठक का ‘हाउस अरेस्ट’ लोकतंत्र की सबसे बड़ी विफलता!
  • सवाल पूछना अब अपराध? भ्रष्टाचार पर मौन न रहने की ये कैसी सजा!

संपादकीय

​लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि यहाँ सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार हर नागरिक को प्राप्त है। लेकिन, जब एक जनप्रतिनिधि या जागरूक नागरिक भ्रष्टाचार, पेपर लीक और चंदा चोरी जैसे ज्वलंत मुद्दों पर सवाल उठाने की घोषणा करता है और जवाब में उसे ‘हाउस अरेस्ट’ का तोहफा मिलता है, तो यह लोकतंत्र के लिए एक बेहद चिंताजनक संकेत है। प्रवीण पाठक और उनके साथियों—चंद्रमणि पांडे, सुदामा—के साथ जो हुआ, वह केवल एक व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं है, बल्कि यह उस हर आवाज़ को दबाने की कोशिश है जो व्यवस्था की खामियों को आईना दिखाना चाहती है।

​जब घर ही बन जाए ‘जेल’

​सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि प्रशासन ने यह कार्रवाई तब की, जब प्रवीण पाठक के पूजनीय पिताजी हार्ट के गंभीर ऑपरेशन के बाद अभी-अभी अस्पताल से घर लौटे हैं। एक ऐसे व्यक्ति को, जिसे चौबीसों घंटे मेडिकल देखभाल और शांतिपूर्ण माहौल की आवश्यकता है, पुलिसिया घेरे में रखना न केवल संवेदनहीनता है, बल्कि मानवीय मूल्यों की पराकाष्ठा है। यदि इस पुलिसिया पहरे की वजह से, आपात स्थिति में उन्हें अस्पताल ले जाने में थोड़ी सी भी देरी हुई और कोई अनहोनी घटी, तो इसकी नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या सत्ता का अहंकार इतना बढ़ गया है कि अब वह ‘इंसानियत’ से भी ऊपर हो गया है?

​वहीं दूसरी ओर, अभय देव शुक्ला को भी मुख्यमंत्री के आगमन के ठीक पहले हाउस अरेस्ट कर लिया गया। यह केवल एक व्यक्ति की कैद नहीं, बल्कि उस हर उस विचार की कैद है जो सत्ता से जवाबदेही मांगता है। पेपर लीक से बर्बाद हुए युवाओं का भविष्य, चंदा चोरी का काला सच और क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार—क्या यही वो मुद्दे हैं जिनका सामना करने से प्रशासन इतना डर रहा है?

डर की राजनीति: स्वागत सूची बनाम लोकतंत्र

​सुबह 5:00 बजे चंद्रमणि पांडे और सुदामा जैसे साथियों को उठा लेना और प्रवीण पाठक व अभय देव शुक्ला जैसे मुखर चेहरों को नजरबंद कर देना, यह साबित करता है कि शासन का पूरा तंत्र ‘सच्चाई’ को दबाने में लगा है। एक तरफ चाटुकारिता की ‘स्वागत सूची’ बनाने की होड़ है, तो दूसरी तरफ सच बोलने वालों के दरवाजों पर पुलिस का पहरा। आखिर मुख्यमंत्री की सुरक्षा के नाम पर यह कैसा सुरक्षा घेरा है, जो जनता के प्रतिनिधियों को ही जनता से काट रहा है?

​सवाल पूछने की सजा: तानाशाही का नया चेहरा

​प्रवीण पाठक और उनके साथियों का ‘अपराध’ क्या था? केवल यह कि वे युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ (पेपर लीक), चंदा चोरी और क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार पर लोकतांत्रिक तरीके से सवाल उठाना चाहते थे। यदि एक जिम्मेदार नागरिक या नेता इन मुद्दों पर बात नहीं करेगा, तो कौन करेगा? क्या सवाल पूछने का अर्थ अब ‘देशद्रोह’ या ‘शांति भंग करना’ हो गया है?

​यह ‘हाउस अरेस्ट’ किसी सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि डर के कारण है। जिस प्रशासन को अपराध और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए पुलिस बल का इस्तेमाल करना चाहिए था, आज वह उसी बल का उपयोग विरोध की आवाज दबाने के लिए कर रहा है। यह सीधे तौर पर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

​सत्ता का दोहरा मापदंड

​एक तरफ ‘स्वागत सूचियों’ में नाम दर्ज कराने की होड़ है, तो दूसरी तरफ सरकार की मुखालफत करने वालों के लिए सुबह 5:00 बजे पुलिस का पहरा। यह दोहरा मापदंड स्पष्ट करता है कि व्यवस्था का रुख किस ओर है। जो सवाल उठाता है, वह शत्रु; जो गुणगान करता है, वह मित्र। क्या यही वह लोकतंत्र है जिसका सपना हमारे पूर्वजों ने देखा था?

​प्रश्न समाज से भी…

​यह घटना ब्राह्मण समाज के प्रबुद्ध जनों और क्षेत्र के युवाओं के लिए एक चेतावनी है। आज एक आवाज़ को खामोश किया गया है, कल दूसरी होगी। यदि आज हम इस तानाशाही के खिलाफ एकजुट नहीं हुए, तो आने वाला कल और भी चुनौतीपूर्ण होगा।

​प्रशासन को यह समझना होगा कि पहरे बिठाकर आवाज़ें तो कुछ समय के लिए दबी जा सकती हैं, लेकिन जन-आक्रोश को हमेशा के लिए नहीं दबाया जा सकता। पुलिस को तुरंत इस अमानवीय घेरेबंदी को समाप्त करना चाहिए और नेताजी के परिवार की संवेदनशील स्थिति का सम्मान करना चाहिए।

यह केवल इन नेताओं का अपमान नहीं, बल्कि पूरे समाज और लोकतंत्र का अपमान है। क्या हमारे क्षेत्र के प्रबुद्ध जन, युवा साथी और ब्राह्मण समाज के जागरूक लोग इस ‘पुलिसिया तानाशाही’ को मौन रहकर स्वीकार करेंगे? आज अगर हमने इस दमघोंटू माहौल पर चुप्पी साधी, तो कल और भी आवाज़ें इसी तरह खामोश कर दी जाएंगी।

प्रशासन को यह समझना होगा कि पहरे बिठाकर और नेताओं को घर में कैद करके आप भले ही मुख्यमंत्री का रास्ता साफ कर दें, लेकिन जनता के मन में उठ रहे आक्रोश को नहीं रोक सकते।

लोकतंत्र की असली मर्यादा मुख्यमंत्री के स्वागत में नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं के समाधान में है। यदि मुख्यमंत्री के आने से पहले ही लोकतंत्र को ‘हाउस अरेस्ट’ करना पड़े, तो फिर विकास के दावों की सच्चाई पर सवाल उठना लाजिमी है।

लोकतंत्र संवाद से चलता है, पुलिस के डंडे या घर में कैद करने की राजनीति से नहीं। सत्ता को यह समझना होगा कि सवाल पूछने वाला दुश्मन नहीं, बल्कि सुधार का एक माध्यम होता है।

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