उत्तर प्रदेशबस्ती

हर्रैया में ‘भाजपा’ की टिकट नीति पर घमासान: कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और दलबदलुओं का बोलबाला

बस्ती: हर्रैया में दलबदलुओं को टिकट मिलने से कार्यकर्ताओं में भारी रोष; क्या 'हर्रैया' में भाजपा को ले डूबेगी कार्यकर्ताओं की अनदेखी?

अजीत मिश्रा (खोजी)

हर्रैया विधानसभा: भाजपा की टिकट वितरण नीति पर उठ रहे सवाल, कार्यकर्ताओं में असंतोष

  • हर्रैया विधानसभा: ‘कार्यकर्ता’ बनाम ‘ठेकेदार’ की जंग, टिकट वितरण पर उठ रहे सवाल
  • पैसे के दम पर टिकट और संगठन की उपेक्षा: हर्रैया में भाजपा के सामने चुनौती

बस्ती: हर्रैया विधानसभा सीट पर भाजपा की टिकट वितरण नीति को लेकर स्थानीय स्तर पर तीखे सवाल उठने लगे हैं। पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर गहरा असंतोष है कि पार्टी लगातार स्थानीय और समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर ‘दलबदलुओं’ को चुनाव मैदान में उतार रही है।

संगठन बनाम बाहरी प्रत्याशी

​यदि पार्टी ने अपनी कार्यशैली में सुधार नहीं किया, तो भविष्य में संगठन के प्रति कार्यकर्ताओं का मोहभंग हो सकता है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे वर्षों से पार्टी को मजबूत करने के लिए मेहनत करते हैं, लेकिन जब टिकट देने की बारी आती है, तो मौका बाहरी लोगों या धनबल वाले नेताओं को दे दिया जाता है।

  • संगठन की उपेक्षा: हर्रैया के लोग और पार्टी कार्यकर्ता इस बात से निराश हैं कि पार्टी बार-बार स्थानीय कार्यकर्ताओं के बजाय ‘दलबदलुओं’ (बाहरी लोगों) पर ही दांव लगाती है।
  • कार्यकर्ताओं में आक्रोश: लंबे समय से मेहनत करने वाले ‘खांटी’ कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की जा रही है, जिससे उनमें भारी रोष है।
  • पैसे का प्रभाव: नेता अब कार्यकर्ताओं के बजाय ‘ठेकेदार टाइप’ के लोगों को प्राथमिकता दे रहे हैं, क्योंकि उनके पास धनबल है। नेताओं को लगता है कि वे पैसे से कार्यकर्ता खरीद सकते हैं।
  • हार का डर: पार्टी की हार का सबसे बड़ा कारण कार्यकर्ताओं का साथ न मिलना है, क्योंकि अब विधायकों को कार्यकर्ताओं की नहीं बल्कि ‘कमाऊपूत ठेकेदारों’ की जरूरत है।
  • इतिहास: यह सिलसिला पुराना है और राजकिशोर सिंह के बाद से ही हर्रैया में दलबदलुओं को टिकट मिलने का चलन सा बन गया है।

‘कार्यकर्ता’ की जगह ‘ठेकेदार’ को तरजीह

​रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान स्थिति यह हो गई है कि नेताओं को अब समर्पित कार्यकर्ताओं की आवश्यकता महसूस नहीं होती। इसके स्थान पर, ऐसे ‘ठेकेदार टाइप’ लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है जो आर्थिक रूप से संपन्न हैं और नेताओं को अधिक लाभ पहुँचा सकते हैं।

हार का मुख्य कारण

​ हर्रैया में भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण जमीनी कार्यकर्ताओं का साथ न मिलना है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि जो लोग पैसे के दम पर पार्टी में आते हैं, वे चुनावी प्रबंधन के लिए तो सक्षम हो सकते हैं, लेकिन वे जनता और कार्यकर्ताओं से जुड़ाव नहीं रख सकते।

पुराना सिलसिला

​क्षेत्र में चर्चा है कि यह दलबदलुओं को टिकट देने का सिलसिला काफी पुराना है, जिससे स्थानीय कार्यकर्ता स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या पार्टी नेतृत्व इस बार स्थानीय संगठन की नाराजगी को दूर करने के लिए अपनी नीति में बदलाव करेगा?

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