जे.जे. हॉस्पिटल की ‘लूट और लापरवाही’: उपभोक्ता आयोग ने सुनाया 8.10 लाख का जुर्माना
किडनी ऑपरेशन में लापरवाही: बस्ती का जे.जे. हॉस्पिटल अब चुकाएगा भारी हर्जाना; मरीज की जान से खिलवाड़ पड़ा महंगा, जे.जे. हॉस्पिटल को देना होगा 8 लाख 10 हजार का हर्जाना
अजीत मिश्रा (खोजी)
जे.जे. हॉस्पिटल की ‘लापरवाही’ का भारी हर्जाना: मरीज के जीवन से खिलवाड़ पर उपभोक्ता आयोग सख्त
- क्या निजी अस्पताल मरीजों के लिए ‘कसाईघर’ बन गए हैं? जे.जे. हॉस्पिटल पर उपभोक्ता आयोग की बड़ी कार्रवाई
- जे.जे. हॉस्पिटल की करतूत: इलाज के नाम पर वसूले पैसे, और बदले में दे दी गंभीर बीमारी!
- बस्ती के जे.जे. हॉस्पिटल के लिए सबक: उपभोक्ता आयोग ने तय की लापरवाही की कीमत
- इलाज या ‘व्यापार’? किडनी ऑपरेशन के नाम पर लापरवाही करने वाले अस्पताल पर आयोग का डंडा
बस्ती/संतकबीरनगर। चिकित्सा क्षेत्र को सेवा का माध्यम माना जाता है, लेकिन बस्ती का ‘जे.जे. हॉस्पिटल’ मरीजों के लिए मुसीबत का सबब बन गया है। किडनी की पथरी का ऑपरेशन करने में बरती गई घोर लापरवाही के एक मामले में जिला उपभोक्ता आयोग ने अस्पताल प्रबंधन पर भारी जुर्माना लगाया है। आयोग ने अस्पताल को इलाज पर हुए खर्च के सात लाख रुपये (10 प्रतिशत ब्याज के साथ) और अतिरिक्त क्षतिपूर्ति के तौर पर एक लाख दस हजार रुपये, यानी कुल आठ लाख दस हजार रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है।
क्या था मामला?
खलीलाबाद के कोड़रा गांव निवासी सोनू कुमार के लिए जे.जे. हॉस्पिटल में कराया गया ऑपरेशन जीवन की सबसे बड़ी भूल साबित हुआ। अक्टूबर 2021 में पथरी के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे सोनू को दूरबीन विधि (लैप्रोस्कोपी) से ऑपरेशन का भरोसा दिया गया था। अस्पताल ने ऑपरेशन के नाम पर न केवल भारी रकम वसूली, बल्कि ऑपरेशन के बाद मरीज की स्थिति और भी गंभीर हो गई।
जब मरीज दोबारा अस्पताल पहुंचा, तो वहां सुधार के बजाय तीन लाख रुपये और ऐंठ लिए गए। अंततः, जब मरीज लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचा, तो वहां की जांच में खुलासा हुआ कि जे.जे. हॉस्पिटल की लापरवाही के कारण पथरी पूरी तरह नहीं निकली थी, जिससे संक्रमण पूरे शरीर में फैल गया था।
न्याय की जीत: कोर्ट ने लगाई लगाम
पीड़ित ने अद्विक लीगल कंसल्टेंसी के माध्यम से जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। साक्ष्यों और तथ्यों का अवलोकन करने के बाद आयोग के अध्यक्ष सुरेंद्र कुमार सिंह और सदस्य संतोष ने अस्पताल को दोषी करार दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि अस्पताल प्रबंधन 60 दिनों के भीतर पूरी धनराशि का भुगतान करे।
सवालिया निशान: कब सुधरेगा निजी अस्पतालों का तंत्र?
यह मामला केवल एक मरीज का नहीं, बल्कि निजी अस्पतालों के उस ‘मुनाफाखोर’ चेहरे को बेनकाब करता है, जहाँ मरीजों की जान से ज्यादा बिल की चिंता की जाती है।
- सवाल ये है: क्या सिर्फ आर्थिक जुर्माने से अस्पताल का रवैया बदलेगा?
- सवाल ये है: स्वास्थ्य विभाग ऐसे अस्पतालों के संचालन पर निगरानी क्यों नहीं रखता?
पीड़ित सोनू कुमार को अपना इलाज कराने के लिए कर्ज लेना पड़ा, जबकि अस्पताल प्रबंधन अपनी गलती मानने को तैयार नहीं था। आयोग का यह फैसला उन अस्पतालों के लिए एक कड़ा सबक है जो स्वास्थ्य सेवा के नाम पर ‘लूट और लापरवाही’ का अड्डा बने हुए हैं।
क्या जिले में स्वास्थ्य विभाग ऐसे अस्पतालों के खिलाफ लाइसेंस रद्द करने या ठोस कार्रवाई करने की हिम्मत दिखाएगा, या फिर मरीज ऐसे ही अपनी गाढ़ी कमाई और स्वास्थ्य को दांव पर लगाते रहेंगे?







