
अजीत मिश्रा (खोजी)
हरैया का ‘आसरा’ बना बेसहारा: 417 लाख का चूना और बदहाली में कैद 84 परिवार
- अंधेरा, गंदगी और दरारें: 417 लाख के ‘आसरा’ में कैद है 84 परिवारों का दम
- सरकारी ‘आसरा’ बना बेसहारा: सुविधा के नाम पर सिर्फ वादे, कागजों में सिमटा विकास
- हरैया के आसरा आवास का ‘दर्द’: अवैध बिजली और पानी के संकट में जी रहे 84 परिवार
- टूटी दीवारें और बंद नल: बदहाली की मार झेल रहा हरैया का आसरा आवास
हरैया (बस्ती): विकास की चकाचौंध के बीच हरैया नगर पंचायत में बनी ‘आसरा आवास’ परियोजना सरकारी धन की बर्बादी और भ्रष्टाचार की एक जीवित मिसाल बन गई है। 417.78 लाख रुपये की भारी-भरकम लागत से खड़ी की गई यह चार मंजिला इमारत आज अपनी ही बदहाली पर आंसू बहा रही है। स्थिति इतनी दयनीय है कि यह भवन हैंडओवर होने से पहले ही खंडहर में तब्दील हो चुका है।
निर्माण में धांधली या घोटालों की इमारत?
साल 2015-16 में समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान जिस भव्य परियोजना का सपना दिखाकर नींव रखी गई थी, आज वह सवालों के घेरे में है। कंस्ट्रक्शन एंड डिजाइन सर्विसेज (संतकबीरनगर यूनिट-20) द्वारा निर्मित इस भवन की गुणवत्ता पर शुरुआत से ही प्रश्नचिह्न लगे थे। नींव की ईंटें अभी ठीक से जमी भी नहीं थीं कि भ्रष्टाचार की दरारें दीवारों पर उभर आईं। यही कारण है कि नगर पंचायत प्रशासन ने इस जर्जर ढांचे को आज तक हैंडओवर लेने की हिम्मत नहीं जुटाई।
बिना सुविधा के नरक बन चुका है ‘आसरा’
भले ही कागजों पर यह ‘आसरा’ हो, लेकिन यहाँ रहने वाले 84 परिवारों के लिए यह किसी नरक से कम नहीं है। बिना बिजली कनेक्शन के ये परिवार अवैध ‘कटिया’ के सहारे अंधेरे को मात देने को मजबूर हैं। पानी की टंकी शोपीस बनी हुई है, जिससे मजबूर होकर महिलाओं को एक सरकारी हैंडपंप के लिए लंबी जद्दोजहद करनी पड़ती है।
”साफ-सफाई का नामोनिशान नहीं है, बीमारियां फैलने का डर हमेशा बना रहता है, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है।” — स्थानीय निवासी
प्रशासनिक दावों की खुली पोल
कोरोना काल के दौरान तत्कालीन एसडीएम द्वारा किए गए आनन-फानन में आवंटन ने इन परिवारों को एक ऐसी मुसीबत में डाल दिया, जहाँ से निकलना नामुमकिन सा लग रहा है। ‘दिशा’ समिति की बैठक में दिए गए कड़े प्रशासनिक अल्टीमेटम की मियाद बीत चुकी है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी अभी भी ‘पत्राचार’ का खेल खेलकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं।
डूडा के परियोजना अधिकारी का यह कहना कि ‘कुछ कमियां रह गई थीं’, उन लोगों के लिए एक क्रूर मजाक जैसा है जो अपनी जान जोखिम में डालकर दरारों भरी दीवारों के बीच रहने को मजबूर हैं।
सवाल ये है कि जिम्मेदार कौन?
क्या 417 लाख रुपये सरकारी खजाने से इसलिए खर्च किए गए थे कि कुछ वर्षों में ही इमारत जर्जर हो जाए? आखिर क्यों निर्माण कंपनी पर अब तक कोई कठोर कार्रवाई नहीं हुई? जब तक अधिकारी केवल कागजी पत्राचार में व्यस्त रहेंगे, तब तक हरैया का यह ‘आसरा आवास’ सिर्फ एक सरकारी विफलता की इमारत बनकर खड़ा रहेगा।
क्या इन 84 परिवारों को तब तक इंतजार करना होगा जब तक कि कोई बड़ा हादसा न हो जाए? प्रशासनिक उदासीनता का यह आलम तब है जब विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। अब देखना यह है कि क्या शासन-प्रशासन की नींद टूटेगी, या यह मामला फिर से फाइलों में दफन हो जाएगा?



















