उत्तर प्रदेशराम मंदिर अयोध्या

राम मंदिर आंदोलन के ‘अनकहे रक्षक’: 500 साल का संकल्प पूरा हुआ, पर अपनों ने ही की उपेक्षा!

अयोध्या के सूर्यवंशी क्षत्रियों का दर्द: राम मंदिर के लिए लड़े, पर ट्रस्ट में नहीं मिली जगह? क्या राम लला के वंशज अब ट्रस्ट से बेगाने? 121 गांवों के सूर्यवंशियों ने मांगा अपना हक! 500 वर्षों का त्याग और अब घोर उपेक्षा: राम मंदिर ट्रस्ट पर सूर्यवंशी क्षत्रियों के गंभीर सवाल!

राम मंदिर आंदोलन के ‘अनकहे रक्षक’: सूर्यवंशी क्षत्रियों का संघर्ष और आज की उपेक्षा

अजीत मिश्रा (खोजी)

ब्यूरो चीफ, वंदे भारत लाईव टीवी न्यूज

​अयोध्या में राम मंदिर का भव्य निर्माण और 2024 में हुई प्राण प्रतिष्ठा न केवल एक धार्मिक आयोजन थी, बल्कि यह 500 वर्षों के उस संकल्प की सिद्धि थी, जिसे अयोध्या के आसपास के 121 गांवों में बसे सूर्यवंशी क्षत्रियों ने अपनी पीढ़ियों से संजोकर रखा था। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि कैसे 16वीं शताब्दी में मीर बाकी के हमले के बाद, गजराज सिंह के नेतृत्व में इन क्षत्रियों ने मंदिर की रक्षा के लिए युद्ध लड़ा और एक कठिन शपथ ली—जब तक राम लला को उनका मंदिर नहीं मिल जाता, तब तक वे न तो पगड़ी पहनेंगे, न छाता और न ही चमड़े के जूते।

​1990-92 आंदोलन: जब स्थानीय आधार बना नींव

​जब 1990 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन ने गति पकड़ी, तो इन सूर्यवंशी क्षत्रियों ने इसे केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के ऋण को चुकाने का अवसर माना।

  • लॉजिस्टिक्स की रीढ़: “सनेथू” और “सराय रासी” जैसे गांव देश भर (कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, पश्चिम बंगाल आदि) से आने वाले कारसेवकों के लिए एक सुरक्षित शरणस्थली बने। यहाँ की महिलाओं ने भोजन जुटाया और गांव के हर सदस्य ने कारसेवकों के ठहरने की व्यवस्था की।
  • पुलिस से सुरक्षा का कवच: स्थानीय सूर्यवंशियों ने कारसेवकों को जन्मभूमि तक पहुँचाने के लिए सुरक्षा घेरा बनाया। बैलगाड़ी, जीप और ट्रैक्टर-ट्रॉली के जरिए पुलिस को छकाया गया और बच्चों ने ‘गुप्तचर’ की भूमिका निभाते हुए पुलिस की गतिविधियों की सूचना दी, जिससे कारसेवकों को सुरक्षित निकाला जा सके।
  • बलिदान का इतिहास: शिव सिंह (सराय रासी) जैसे कई स्थानीय लोग आंदोलन के हर चरण में सक्रिय रहे और जेल की यातनाएं सही। ये वो लोग थे जिन्होंने बिना किसी प्रचार के, जमीनी स्तर पर आंदोलन की रसद और सुरक्षा संभाली।

​ट्रस्ट में अनदेखी: एक गौरवशाली समाज का असंतोष

​आज जब मंदिर भव्य रूप में खड़ा है, तो उस समाज में गहरा असंतोष है जिसने 500 वर्षों तक इस संघर्ष की मशाल जलाए रखी। क्षत्रिय उत्थान समिति के संरक्षक गुरु प्रसाद सिंह ने हाल ही में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा है कि ट्रस्ट में सूर्यवंशियों की पूरी तरह से अनदेखी की गई है।

​उनका स्पष्ट कहना है कि:

  • ​राम लला के वंशज होने का दावा करने वाले इन 121 गांवों के लोगों को मंदिर के वर्तमान प्रबंधन या ट्रस्ट में कोई आधिकारिक स्थान नहीं दिया गया है।
  • ​समिति के अनिल कुमार सिंह, नरेंद्र सिंह, नंद कुमार सिंह अनिल, सुधीर सिंह मुन्ना, एकादशी सिंह, सतीश कुमार सिंह, शीतला प्रसाद सिंह, डॉ. शिवबख्श सिंह, मेघराज सिंह बादल, शिव सिंह और शिव दुलारे सिंह जैसे वरिष्ठों ने मांग की है कि मंदिर के कुशल प्रबंधन के लिए ट्रस्ट में सूर्यवंशी क्षत्रियों को उचित प्रतिनिधित्व मिलना समय की मांग है।

निष्कर्ष:

राम मंदिर आंदोलन महज एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि आम जनमानस के बलिदान की गाथा है। जिन लोगों ने 500 साल तक नंगे पैर रहकर, पगड़ी त्यागकर अपना जीवन इस लक्ष्य के लिए समर्पित किया, उनकी अनदेखी न केवल उनके इतिहास का अपमान है, बल्कि यह उस ‘राम राज्य’ की परिकल्पना पर भी सवाल खड़े करती है जहाँ हर रक्षक का सम्मान होना चाहिए। क्या ट्रस्ट अब इन ‘अनकहे रक्षकों’ की सुध लेगा?

Back to top button
error: Content is protected !!