उत्तर प्रदेशबस्तीसिद्धार्थनगर 

नशे की गिरफ्त में बस्ती: छोटी मछलियां जेल, ‘माफिया’ मालामाल, आखिर कौन है जिम्मेदार?

प्रशासनिक मिलीभगत या उदासीनता? बस्ती में सरेआम बिक रहा है मौत का सामान। विक्रमजोत से पुरानी बस्ती तक 'नशे का नेटवर्क': क्या कानून सो रहा है या बिक चुका है?

अजीत मिश्रा (खोजी)

नशे का जाल: बस्ती की युवा पीढ़ी का भविष्य और प्रशासनिक ‘मौन’ का सच

  • बस्ती: नशे के जाल में फंसा भविष्य, प्रशासन की मिलीभगत पर सवाल।
  • मौत के सौदागर और प्रशासनिक ‘मौन’: बस्ती की दहला देने वाली सच्चाई।
  • नशाखोरी का गढ़ बनती बस्ती: छोटे प्यादे गिरफ्तार, मास्टरमाइंड क्यों फरार?

​बस्ती जनपद की फिजाओं में इन दिनों एक धीमा जहर घुल रहा है। विक्रमजोत से लेकर छावनी, चिलमा बाजार (दुबौलिया), महराजगंज, हनुमानगंज और पुरानी बस्ती तक—ऐसा कोई कोना नहीं बचा, जहाँ नशे का यह काला कारोबार अपने पैर न पसार चुका हो। गली-कूचों से लेकर मुख्य बाजारों तक, नशे की पुड़ियां और घातक पदार्थ सरेआम उपलब्ध हैं, और सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस सब के बावजूद प्रशासन की चुप्पी एक बड़े सवालों को जन्म दे रही है।

​प्रशासनिक मिलीभगत या उदासीनता?

​जब आम नागरिक, जागरूक युवा या सामाजिक संगठन बार-बार संबंधित विभागों को इस अवैध कारोबार की सूचना देते हैं, तब भी जमीनी स्तर पर कोई ठोस बदलाव न होना इस बात की ओर स्पष्ट इशारा है कि ‘सब कुछ जानते हुए भी अनजान’ बना जा रहा है।

​अक्सर जब दबाव बढ़ता है, तो विभाग द्वारा कुछ छुटभैया विक्रेताओं या नशे के आदी युवाओं को पकड़कर ‘औपचारिकता’ पूरी कर ली जाती है। यह एक ऐसा तमाशा है, जिसमें नशा माफिया पर्दे के पीछे सुरक्षित रहता है और प्रशासन अपनी ‘सफलता’ का ढोल पीटता है। क्या यह महज नाकामी है, या फिर यह ‘मिलीभगत’ की एक सोची-समझी पटकथा है?

​’माफिया’ की पहुंच से दूर कानून

​असली नशा माफिया, जो इस पूरे नेटवर्क की जड़ें जमाए बैठा है, वह न केवल कानून की पकड़ से दूर है, बल्कि उसका नाम तक फाइलों में दर्ज नहीं होने दिया जाता। जब बड़ी मछलियों पर हाथ नहीं डाला जाता, तो यह साबित हो जाता है कि या तो जांच का दायरा जानबूझकर छोटा रखा गया है या फिर तस्करों और तंत्र के बीच एक ‘अघोषित समझौता’ है।

​सामाजिक उदासीनता का संकट

​समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी इस समस्या को ‘दूसरों के बच्चों की समस्या’ समझकर नजरअंदाज कर रहा है। लेकिन, नशा किसी के घर का दरवाजा देखकर नहीं आता। आज यदि विक्रमजोत या पुरानी बस्ती की गलियों में किसी का घर बर्बाद हो रहा है, तो कल यह आग किसी भी घर को अपनी चपेट में ले सकती है।

​एक तीखा सवाल

प्रशासन से मेरा सीधा सवाल है: यदि सूचना देने के बावजूद माफिया आजाद घूम रहे हैं, तो यह जनता के विश्वास का गला घोंटना नहीं है तो क्या है?

  • ​क्या कागजी खानापूर्ति और छोटी गिरफ्तारियां, माफियाओं को संरक्षण देने का एक तरीका है?
  • ​बस्ती के युवाओं के भविष्य के साथ हो रहे इस खिलवाड़ का जिम्मेदार कौन है?

​नशाखोरी केवल एक अपराध नहीं, बल्कि एक सुनियोजित नरसंहार है। यदि इसे समय रहते नहीं रोका गया, तो बस्ती का भविष्य गर्त में चला जाएगा। अब समय आ गया है कि जनता केवल शिकायत न करे, बल्कि प्रशासन की जवाबदेही तय करे। हमें न केवल छोटे प्यादों को, बल्कि उन सरगनाओं को बेनकाब करने की जरूरत है जो पुलिस की वर्दी और सत्ता की ताकत के साये में अपनी तिजोरियां भर रहे हैं।

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