आयुष विभाग में हड़कंप: कुमारगंज कांड के बाद अब सभी 130 बीएमएस-बीयूएमएस चिकित्सकों के प्रमाण पत्रों की होगी पुनर्जांच।
सुनील कुमार को लेकर अन्य चिकित्सकों ने भी पंजीकरण के दौरान फर्जी सर्टिफिकेट दस्तावेजों का सहारा लिया। इसी आधार के बीच केंद्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी डॉ. रामसूरत वर्मा ने जिले में पंजीकृत सभी 130 चिकित्सकों की फाइलें दोबारा जांच के लिए निकाला है।
अजीत मिश्रा (खोजी)
स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ खिलवाड़: फर्जी डिग्रियां और सवालों के घेरे में बैठी सरकारी मशीनरी
- सवालों के घेरे में पंजीकरण तंत्र: क्या कागजी दस्तावेजों की आड़ में बेखौफ फल-फूल रहा है फर्जी डॉक्टरों का रैकेट?
- जाग, सोया हुआ तंत्र! एक मामला सामने आने पर खुली आंखें, तो क्या बाकी मामलों में विभाग की थी मिलीभगत?
अयोध्या के कुमारगंज से सामने आया फर्जी डिग्री का मामला कोई इकलौता वाकया नहीं है, बल्कि यह उस सड़े-गले तंत्र की पोल खोलता है जो आम जनता की जिंदगी के साथ सरेआम खिलवाड़ कर रहा है। एक तथाकथित ‘संदिग्ध डिग्री’ (सुनील कुमार प्रकरण) के उजागर होते ही आयुष विभाग में जो भूचाल आया है, वह इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि जिम्मेदार महकमा कितनी गहरी नींद में सो रहा था।
क्या भगवान भरोसे चल रहा है इलाज?
- 130 डॉक्टरों की फाइलें जांच के घेरे में: महज एक मामले ने विभाग को हिलाकर रख दिया और अब जिले के सभी 95 बीएमएस और 35 बीयूएमएस चिकित्सकों के दस्तावेजों की नए सिरे से जांच कराई जा रही है।
- सिस्टम की सुरक्षा पर गंभीर सवाल: जिन फर्जी या संदिग्ध डिग्रियों के सहारे ये तथाकथित डॉक्टर मरीजों की जान से खेल रहे थे, उनके पास ‘एचपी आईडी’ (HP ID) भी थी और उनके विवरण भारत सरकार के पोर्टल पर भी दर्ज थे। आखिर केंद्रीय और क्षेत्रीय पोर्टलों की यह कैसी सुरक्षा है जहाँ कागजी फर्जीवाड़ा आसानी से सिस्टम को चकमा दे जाता है?
- जागने में इतनी देर क्यों?: क्या विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत के बिना ऐसे फर्जी प्रमाणपत्रों का पंजीकरण संभव है? क्या फाइलें तभी खुलती हैं जब मीडिया या किसी स्वतंत्र पड़ताल द्वारा मामले का भंडाफोड़ किया जाता है?
कागजों पर डॉक्टर, जमीन पर मौत के सौदागर
जनस्वास्थ्य जैसी अत्यंत संवेदनशील सेवा को मजाक बना दिया गया है। यदि एक मामले से 130 फाइलों की परतें उधड़ सकती हैं, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस तरह के फर्जीवाड़े का जाल कितना गहरा और व्यापक होगा।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, जब जिले में 130 पंजीकृत डॉक्टरों की फाइलें जांच के दायरे में हैं तो ज्यादा होने के बाद भी पारदर्शिता की प्रक्रिया में कोई अन्य अनियमितता सामने आती है तो सभी प्रमाणपत्र सही पाए जाते हैं। फिलहाल आयुष विभाग की यह कवायद साफ संकेत दे रही है कि सुनील कुमार का मामला अब एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहा।
अब समय आ गया है कि सिर्फ कागजी जांच और खानापूर्ति से काम न चलाया जाए। इस पूरे रैकेट के पीछे छिपे सरगनाओं और उन भ्रष्ट अधिकारियों को बेनकाब किया जाए जिनकी नाक के नीचे यह गोरखधंधा फल-फूल रहा है। जब तक फर्जी डॉक्टरों को जेल की सलाखों के पीछे और लापरवाह अधिकारियों को बर्खास्त नहीं किया जाता, तब तक आम जनता की जिंदगी भगवान भरोसे ही रहेगी।












