
समीर वानखेड़े ब्यूरो चीफ:
गडचिरोली/एटापल्ली* | रक्षाबंधन के दिन जब बहन की रक्षा की कसमें खाई जा रही थीं, उसी दिन एटापल्ली तालुका के दुर्गम कोईंदूळ गांव में एक ‘लाडकी बहिण’ को अपनी जान हथेली पर लेकर बढ़ के पानी में से गुजरना पड़ा।
नदी पर पुल न होने से एम्बुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकी। आखिर में गांव वालों ने 26 साल की गर्भवती छाया सुरेश नैताम को स्ट्रेचर पर उठाकर बाढ़ के पानी में से नदी पार कराई। इससे ‘लाडकी बहिण’ के सम्मान के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का फर्क एक बार फिर सामने आ गया है।
*क्या हुआ था?*
शुक्रवार (28 अगस्त) सुबह करीब 9 बजे छाया को प्रसव पीड़ा शुरू हुई। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना जरूरी था। लेकिन गांव को जोड़ने वाला पक्का रास्ता और नदी पर पुल न होने से बाढ़ का पानी रास्ता रोककर खड़ा था। एम्बुलेंस गांव तक आ ही नहीं पाई। हालात की गंभीरता देखते हुए ग्रामीणों ने छाया को स्ट्रेचर पर डालकर बाढ़ के पानी से नदी के उस पार पहुंचाया। इसके बाद उन्हें कसनसूर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया। हालत गंभीर होने पर आगे के इलाज के लिए एटापल्ली के रास्ते हेडरी के अस्पताल में शिफ्ट किया गया।
*ये पहली घटना नहीं*
कोईंदूळ में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। 20 जुलाई को ही पुष्पा सुनील परसा नाम की गर्भवती महिला को भी सड़क न होने से डेढ़ किलोमीटर तक स्ट्रेचर पर उठाकर एम्बुलेंस तक ले जाना पड़ा था। उस घटना के बाद भी रास्ता और पुल का काम जस का तस है। कुछ ही हफ्तों में फिर उसी गांव की दूसरी गर्भवती को पूर से स्ट्रेचर पर ले जाना पड़ा। ग्रामस्थ पूछ रहे हैं कि आखिर प्रशासन ने पिछली घटना से क्या सबक लिया?
*खनिज से करोड़ों का राजस्व, गांव में सड़क तक नहीं*
कोईंदूळ समेत आसपास के चार गांवों को हर साल बारिश में इसी समस्या से जूझना पड़ता है। नदी-नाले में बाढ़ आते ही एम्बुलेंस गांव तक नहीं पहुंचती। बीमार, गर्भवती या इमरजेंसी मरीजों को बाढ़ के पानी से ही बाहर लाना पड़ता है।
दुर्भाग्य की बात यह है कि लोह-अयस्क की समृद्धि से एटापल्ली तालुका से सरकार को करोड़ों का राजस्व मिलता है, लेकिन इसी तालुका के दुर्गम आदिवासी गांवों में आज भी सड़क, पुल, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। एक तरफ खनिज से करोड़ों की कमाई और दूसरी तरफ गर्भवती को बाढ़ के पानी में स्ट्रेचर पर ले जाना, ये विकास की प्राथमिकताओं पर ही सवाल खड़ा करता है।






