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ड्रग विभाग की ‘अंधी’ मेहरबानी: बिना पते के मिला लाइसेंस, अब मास्टरमाइंड दे रहा है चकमा।

SIT की 'सुस्त' चाल और मास्टरमाइंड का 'स्मार्ट' खेल: सवा महीना बीता, हाथ अब भी खाली।

अजीत मिश्रा (खोजी)

फाइलें सफेद, कारोबार काला: स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे कैसे फला-फूला नशे का सिंडिकेट?

शनिवार 17 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। कोडीन सिरप के अवैध धंधे में ‘गणपति फार्मा’ का मामला केवल एक पुलिसिया जांच का विषय नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य और औषधि प्रशासन विभाग की कार्यशैली पर एक काला धब्बा है। सवा लाख से अधिक नशीली शीशियों का इधर से उधर हो जाना और विभाग का हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना यह बताने के लिए काफी है कि सिस्टम के भीतर ‘दीमक’ लग चुकी है।

🔥कागजी जांच या कागजी खानापूर्ति?

हैरानी इस बात पर है कि जिस ‘गणपति फार्मा’ को पुलिस ‘बोगस’ बता रही है, उसे ड्रग लाइसेंस जारी करते समय क्या अधिकारियों की आंखों पर पट्टी बंधी थी? नियम कहते हैं कि लाइसेंस देने से पहले पते का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) अनिवार्य है। फिर कैसे एक ‘भूतिया’ पते पर फर्म रजिस्टर हो गई? क्या विभागीय बाबुओं ने एयरकंडीशन कमरों में बैठकर ही जांच की रिपोर्ट लगा दी थी? यह लापरवाही नहीं, बल्कि उन युवाओं के भविष्य के साथ सौदा है जिन्हें इस कोडीन के जरिए नशे के गर्त में धकेला जा रहा है।

🔥रडार से बाहर कैसे रहे ‘लाखों’ के सौदे?

कोडीन युक्त सिरप ‘शेड्यूल-H’ ड्रग के तहत आती है, जिसका एक-एक मिलीग्राम का हिसाब रखना अनिवार्य है। 1.72 लाख शीशियां सप्लाई हो गईं, गोयल फार्मा पर हजारों बोतलें मिलीं, लेकिन औषधि निरीक्षक और विभागीय लेखाकारों को इसकी भनक तक नहीं लगी? यह विफलता चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि या तो विभाग पूरी तरह अक्षम है, या फिर उसे इस काले कारोबार का हिस्सा पहुँचाया जा रहा था।

🔥जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी के मायने

जब पुलिस साक्ष्य जुटा रही है, तब औषधि विभाग के बड़े अधिकारी चुप्पी साधे क्यों बैठे हैं? क्या उन कर्मचारियों पर अब तक कोई कार्रवाई हुई जिन्होंने फर्जी दस्तावेजों को हरी झंडी दिखाई? जनता यह जानना चाहती है कि:

बिना भौतिक सत्यापन के लाइसेंस देने वाले इंस्पेक्टर पर एफआईआर (FIR) कब होगी?

दो साल से चल रहे इस खेल को पकड़ने में विफल रहे ‘तकनीकी सहायकों’ की जवाबदेही कब तय होगी?

🔥सिस्टम का ‘सुरक्षा कवच’

मास्टरमाइंड का पुलिस को चकमा देना समझ आता है, लेकिन सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर कानून की धज्जियां उड़ाना बिना ‘भीतरी मदद’ के मुमकिन नहीं है। पुलिस भले ही कड़ियां जोड़ रही हो, लेकिन असली अपराधी वे सफ़ेदपोश भी हैं जिन्होंने अपनी कलम की ताकत का इस्तेमाल इस अवैध धंधे को ‘वैध’ कवर देने के लिए किया।

अगर अब भी विभागीय रसूखदारों पर गाज नहीं गिरी, तो समझ लीजिए कि यह जांच केवल छोटी मछलियों को फंसाने और मगरमच्छों को सुरक्षित रास्ता देने का एक और सरकारी नाटक है।

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