
सुरेन्द्र दुबे डिस्टिक हेड धार जिले के पीथमपुर मे
नशे का नंगा सच: यह कहना गलत नहीं होगा कि शराब की बोतलें नहीं बिक रही, ज़िंदगियाँ बिक रही हैं!शराब अब सिर्फ एक बुरी आदत नहीं रही—यह समाज के सीने में धँसा हुआ ज़हरीला खंजर बन चुकी है। हर गली, हर मोहल्ले और हर गांव में खुलेआम बिकती शराब इस बात का सबूत है कि व्यवस्था ने आंखें बंद कर ली हैं और आम आदमी चुप्पी साधे बैठा है।जिस शराब को “शौक” और “मनोरंजन” कहकर बेचा जा रहा है, वह असल में गरीब की रोटी, बच्चे की पढ़ाई और औरत की सुरक्षा निगल रही है। घर का कमाने वाला हाथ जब बोतल पकड़ लेता है, तो घर की रसोई सूनी हो जाती है। यही नहीं—नशे में धुत वही हाथ मारपीट,गाली-गलौच और अपराध का हथियार भी बन जाता है।सबसे भयावह तस्वीर कच्ची और अवैध शराब की है। सस्ती कीमत पर बिकने वाला यह ज़हर सीधे मौत की फैक्ट्री है। अंधापन, लकवा, जानलेवा बीमारी और ताबड़तोड़ मौतें—यह सब हादसे नहीं, बल्कि सरकार और प्रशासनिक लापरवाही और मुनाफाखोरी का परिणाम हैं। सवाल साफ है—जब ज़हर बिक रहा है, तो जिम्मेदार कौन है?सड़क हादसों से लेकर घरेलू हिंसा तक, थानों से लेकर अस्पतालों तक—हर जगह नशे की बदबू फैली हुई है। फिर भी कार्रवाई के नाम पर कभी दिखावटी छापे, तो कभी आंकड़ों की बाज़ीगरी। नशे के सौदागर बेखौफ हैं और समाज मजबूर।अब यह मान लेना होगा कि शराब “व्यक्तिगत पसंद” नहीं, बल्कि सार्वजनिक तबाही है। जो व्यवस्था शराब से राजस्व कमाकर अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहती है, वह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से खिलवाड़ कर रही है।आज अगर समाज नहीं जागा, तो कल सवाल पूछने वाला कोई नहीं बचेगा।नशे के खिलाफ चुप्पी—अपराध में साझेदारी है।शराब छोड़ना कमजोरी नहीं, बगावत है उस सिस्टम के खिलाफ जो बोतल बेचकर घर उजाड़ रहा है।अब भी वक्त है—या तो शराब रुकेगी,या समाज टूटेगा। समाज के लिए व्यवस्था और सरकार इस मामले में पूरी तरह जिम्मेदार है लेकिन सरकार अंधी बहरी और गूंगी बन चुकी है अब समाज को अंधा गूंगा और बहरेपन से बाहर निकलकर सामूहिक आवाज उठानी होगी।




